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कौन संभालेगा पत्रकारिता का गिरता स्तर : संतोष गंगेले
7/6/2014 8:44:38 PM
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- संतोष गंगेले

जादी के बाद भारतीय पत्रकारिता ने जिस प्रकार की उड़ान भरी उसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी। अंग्रेजी शासन के दौरान जिन्होने पत्रकारिता की शुरुआत की थी, देश के सबसे बड़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे वह। अंग्रेजो के जाने के बाद आजाद भारत में ऐसे पत्रकारों को संविधान में स्वतंत्रता सेनानी घोषित नहीं किया गया। यह पत्रकारों के साथ अन्याय व पक्षपात ही कहा जा सकता है। आजादी के पूर्व की पत्रकारिता सार्वजनिक सूचना संदेश प्रिंट मीडिया का जन्म भी विदेशों में होने का लेख मिलता है लेकिन हमारी भारतीय संस्कृति के इतिहास में पत्रकारिता का जन्म बहुत पहले से चला आ रहा है जिसका श्रेय देवर्षि नारद जी को जाता है। उसके बाद रामभक्त श्री हनुमान जी को इसका श्रेय जाता है। इस प्रकार से भारतीय पत्रकारिता के प्रमाण का इतिहास बहुत पुराना है।

देश के अंदर मुनादी कराकर शिलालेखों के माध्यम से व प्रचार सामग्री के माध्यम के बाद समाचार पत्रों के माध्यम से शासन-प्रशासन की खबर जनता तक, जनता की खबर सरकार तक देना भी पत्रकारिता ही हुआ करती थी। भौतिकवादी युग में आपराधिक समाचार, नेताओं, अधिकारियों के भ्रष्टाचार, उनके काले कारनामे ही वर्तमान में पत्रकारिता की मुख्य सुर्खिया रह गई है।

भारतीय इतिहास में पत्रकारिता को जनसंचार के स्रोत कहा जाता है। पत्रकारिता को हम संदेश, सूचना के रूप में स्वीकार करते है। पत्रकारिता के माध्यम के विकास की गति के साथ-साथ विभिन्न संसाधन उपलध्य होने के कारण हस्तलिखित समाचार, संदेश व सूचनाएं लोगों तक पहुंचाई जाती रही हैं। धीरे-धीरे समाचार के आदान-प्रदान के साधन आपस में मिलने के अलावा चिठ्ठी-पत्री ही हुआ करते थे। उसके बाद मुद्रण यंत्र (प्रिंटिंग प्रेस) आने के बाद प्रिंट मीडिया का अविष्कार हुआ जिससे लघु एवं छोटे-छोटे समाचार पत्र प्रकाशित किए जाने लगे। भारत में लगभग सौ वर्ष पूर्व अनेक समाचार पत्रों का प्रकाशन शुरु हुआ। तब समाचार पत्रों का पंजीयन आवश्यक किया गया। प्रेस अधिनियम व पत्रकारिता के नियम व कानून बनाए गये। गुलाम भारत को आजादी दिलाने में समाचार पत्रों की अहम भूमिका रही। पत्र, पत्रिकाएं, समाचार पत्र जनता की आवाज बनकर एक सशक्त माध्यम बन गये। सरकार विरोधी खबरों को छोड़कर तब खबरों का भरपूर आदान प्रदान हुआ करता था। देश के नेताओं, महापुरुषों की पहचान भी समाचार पत्रों के कारण बनी। देश आजाद होने के बाद प्रेस को भी आजादी दी गई तथा आम व्यक्ति को संविधान के तहत उनके मौलिक अधिकारों के साथ अपनी बात कहने और उसको जन-जन तक पहुंचाने के लिए प्रेस को आजादी दी गई। प्रेस की आजादी के साथ समाचार पत्रों के पंजीयन सरल होने के कारण देश के अंदर सैकड़ों समाचार पत्रों का हिंदी, अंग्रेजी तथा क्षेत्रीय भाषाओं में प्रकाशन आरंभ हुआ। आकाशवाणी (रेडियों) के माध्यम से देश की जनता को जाग्रत किया गया। भारतीय संस्कृति एंव संस्कारों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए सांस्कृतिक आयोजनों का प्रकाशन, प्रसारण किया गया। समाचार पत्रों को आर्थिक दृष्टि से संपन्न बनाने के लिए विज्ञापन नीति बनाई गई। 1962 में भारत-पाक, भारत-चीन युद्ध के बाद समाचारों का महत्व बढ़ गया तथा 1971 के भारत-पाक युद्ध के साथ पत्रकारिता अपने चरम तक पहुंच गई थी। 1980 में प्रिंट मीडिया के साथ साथ इलेक्ट्रानिक मीडिया का महत्व सामने आने लगा, जिससे कैमरा, वीडियोंग्राफी,  रिकार्डिंग,  एलबम बनाने की सुविधा होने से पत्रकारिता में उनका लाभ उठाया जाने लगा।

देश में होने वाले आंतकवाद की शुरुआत 1982 के आस पास हुई। जिसके परिणामस्वरूप भारतरत्न प्रधानमंत्री इंदिरा गॉधी की हत्या हुई और इससके बाद भारत में आतंकवाद का तूफान आ गया। 1982 में एशियाड  का आयोजन होने के बाद इलेक्ट्रानिक मीडियॉ ने अपना सशक्त कदम रखा। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गॉधी ने इलेक्ट्रानिक मीडिया को भारत में बढ़ावा दिया और देश के अंदर पल-पल की, ऑखों देखी खबरें, आम जन तक पहुंचने लगीं। देश में लाखों समाचार पत्रों के प्रकाशन के साथ-साथ टीवी चैनल, सोशल मीडिया, बेब साईट, बेब पोर्टल जैसे अनेकानेक आविष्कार हुए। इसके बाद सोशल मीडिया के आगमन हुआ। इलेक्ट्रानिक मीडिया के साथ साथ मोबाईल एवं उसमें मिलने वाली सुविधाओं के कारण दुनियॉ मुठ्ठी में आ गई। आज हम एक-एक पल की खबर प्राप्त करते हैं। इस प्रकार के आविष्कार से जहां मानव की आवश्यकताओं को राहत मिली वहीं समय का व्यय भी कम हुआ लेकिन इनके दुष्परिणाम भी देखने को मिल रहे है।

भारतीय पत्रकारिता की आजादी को बनाए रखने के लिए संविधान में जो कानूनी धाराएं हैं, उनका ज्ञान बहुत से पत्रकारों को नहीं है। भारतीय पत्रकारिता के लिए प्रेस परिषद का गठन किया जाता है। उसमें देश भर के निर्वाचित एवं मनोनीत सदस्य होते है। भारतीय प्रेस परिषद को किसी भी संपादकए पत्रकार,  पत्र व चैनल को एक सीमा के अंदर नियमित करने के अधिकार तो दिये गए हैं लेकिन सजा के अधिकार नहीं दिए हैं। पत्रकारिता से पीड़ित व परेशान व्यक्ति को न्याय प्रदान कराने की समय सीमा भी नहीं रखी गई है। इस प्रकार पत्रकारिता की आजादी का एक तरह से दुरूपयोग भी हो रहा है। समाचार पत्रों के प्रकाशन, इलेक्ट्रानिक चैनलों के प्रसारण के जो नियम व कानून है उनका पालन करवाने वाले स्वयं ही कानून की धज्जियॉ उड़ाते पाये जायें तो फिर न्याय मिलने की आशा नहीं रहती। इसलिए आम व्यक्ति पत्रकारिता से जुड़े लोगों से उलझना उचित नहीं समझते हैं। यदि पत्रकारिता के नियम व कानून के तहत समाचार प्रकाशन, प्रसारण की सीमा लांघने पर तत्काल समाचार पत्र का प्रकाशन एवं चैनल का प्रसारण बंद करने बाली कमेटी बनाई जाएं तो आजाद भारत में प्रजातंत्र का ‘चौथा स्तंभ’ देश के लिए अपने कर्तव्य व दायित्व का निर्वहन कर सकता है। अन्यथा पत्रकारिता विज्ञापन एवं व्यवसायिक संस्था मात्र बनते जाने से इसका लाभ सीधे तौर पर संपादक, प्रकाशक, मुद्रक एवं संचालक को ही मिलेगा। पत्रकारिता से जुड़े कर्मचारी, संवाददाता, प्रतिनिधि व ब्यूरों चीफ अपने परिवार के भरण पोषण के लिए अपनी नैतिक जिम्मेदारी का त्याग कर, कहीं न कहीं से गलत रास्ते तय करेगा तथा उस पर कालावाजारी, भ्रष्टाचार, ब्लैकमेल जैसे आरोप लगते रहेंगे।

आजादी के बाद जो पत्रकारिता एक मिशन एवं जनता की आवाज हुआ करती थी तथा पत्रकार सीमा पर खड़े सैनिक की तरह देश के अंदर अपने कर्तव्यों का पालन किया करते थे। आज वही पत्रकारिता सम्मान का रास्ता तय कर रही है। साथ ही अपराधों को दबाने, कानून की रक्षा करने की बजाय नेताओं, जनप्रतिनिधिओं, अपराधियों की चाटुकारिता का हथियार बन चुकी है। दूसरी ओर समाचार पत्र बेचने वाले ऐजेंट, हॉकर प्रजातंत्र के चौथें स्तंभ को गिराने के लिए गरजते रहते हैं। पत्रकारिता जोखिम भरे कॉटों का रास्ता बन गयी है। इस पर चलने वालों को न तो भारत सरकार कोई सुरक्षा दे पा रही है, न ही प्रदेश सरकारें पत्रकारों के परिवारों के भरण पोषण एवं सुरक्षा के लिए उपाय कर रही हैं। इसलिए पत्रकारिता कागजों एवं प्रसारण तक सीमित हो रही है। देश व प्रदेश में पत्रकारों के हितों के लिए कार्य करने बाले संगठनों में भी आगे-पीछे से ईमानदारी के दरवाजे बंद होने के कारण संगठन एवं उनसे जुड़े पदाधिकारी किसी न किसी राजनैतिक दलों के साथ जुड़े है या वह अपनी आमदानी के लिए गलत रास्ता तय कर अपने अपने संगठनों का संचालित करने में पीछे नहीं है।

निहित स्वार्थों वाली व गलत पत्रकारिता के विरोध में लिखना हमारी मजबूरी नहीं बल्कि कर्तव्य व दायित्य भी बनता है। इसलिए मध्य प्रदेश में ‘गणेश शंकर विद्यार्थी प्रेस क्लब’ का विशाल संगठन तैयार करने के लिए होनहार, कर्तव्य निष्ठा से परिपूर्ण, समाजसेवा से जुड़े स्वतंत्र पत्रकार, साहित्यकार, प्रिंट मीडिया, इलैक्ट्रानिक मीडिया से जुड़े लोगों की तलाश में हमें लगना होगा जिससे भारतीय पत्रकारिता की निष्पक्षताए सफलता विश्व पटल पर देखी जा सके।

(लेक गणेश शंकर विद्यार्थी प्रेस क्लब, मध्य प्रदेश के अध्यक्ष हैं) 

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Who will stop tho lowering level of journalism : Santosh gangele

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