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कहने का ढंग - संजय सिन्हा
9/25/2014 1:19:24 PM
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- संजय सिन्हा

मैं दो ऐसे व्यक्तियों को जानता हूं जो आपस में दोस्त हैं, लेकिन एक जब कुछ करने चलता है तो उसका काम अटक जाता है, दूसरा उसी काम को बखूबी अंजाम दे आता है। पहला व्यक्ति अक्सर मुझसे पूछता है कि उसके दोस्त में ऐसे कौन से सुरखाब के पर लगे हैं कि वह उसी व्यक्ति से अपना काम निकलवा लेता है, जो उसके कहे को सिरे से ना कह देता है।

बात सचमुच सोचने वाली थी। आखिर एक आदमी किसी काम को पूरे मन से अंजाम देने की कोशिश करता है, और उसे नाकामी हाथ लगती है, जबकि दूसरा उसी काम को करता है और कामयाबी हाथ लगती है।

आखिर क्यों?

आखिर क्यों कोई व्यक्ति किसी इंटरव्यू में जाता है और फेल हो जाता है, दूसरा पास हो जाता है? किसी की कोई बात किसी को बुरी लग जाती है, और दूसरे की वही बात उसे भा जाती है। क्या ये ग्रहों का चक्कर होता है? क्या ये कुंडली का दोष होता है?

आप कुछ भी सोच सकते हैं, लेकिन मुझे हमेशा लगता है कि हम किस वक्त किस तरीके से खुद को प्रस्तुत करते हैं, ये सबसे अहम होता है। अंग्रेजी में इसे टाइमिंग कहते हैं। टाइमिंग अर्थात सही समय पर सही तरीके से अपनी बात को रखना। ज्योतिष शास्त्र में इसे ही 'समय का अच्छा होना' और 'बुरा होना' माना जाता होगा? ऐसा मुझे लगता है।

मेरे पास दफ्तर का एक कर्मचारी छुट्टी मांगने आता है, और मैं उसे 'ना' कर देता हूं। थोड़ी देर में दूसरा व्यक्ति आता है और मैं 'हां' कह देता हूं।

पहले वाले को लगता है कि मैं भेदभाव करता हूं। लेकिन ये सही नहीं है। सही ये है कि पहला कभी भी यूं ही उठ कर आता है और पूछता है, "सर क्या मैं तीन दिनों की छुट्टी ले लूं?"

मैं कहता हूं, "नहीं, मुश्किल हो जाएगी।"

दूसरा आता है, कहता है, "सर कल कल का पूरा काम हो चुका है, सबकुछ कुछ नियंत्रण में है।"

मैं कहता हूं, "बहुत अच्छे।

वह आगे कहता है, "सर कल के लिए कुछ है नहीं, और मैंने फलां को बाकी का सब समझा दिया है। अगर आप कहें तो कल जरा छुट्टी ले लूं?"

मैं हां कहता ही हूं कि तभी वह कहता है सर परसों मां आ रही है, गांव से। तो परसों स्टेशन जाना है, अगर आप हां कहें तो मैं थोड़ी देर से दफ्तर आ जाउंगा।

 उसके इतना कहते ही मैं बोल उठता हूं, "अरे, मां आ रही है, कोई बात नहीं। देर से क्या आना, तुम छुट्टी ले लो।"

मुझे परम यकीन है कि वह बाहर जाकर उस पहले वाले कर्मचारी को जलाता होगा कि देखो मैं छुट्टी ले आया, और तुम?

दूसरा वाला मुझे मन ही मन गाली देता होगा, सोचता होगा कि बॉस भेदभाव करता है।

अब सुनिए, मैं भेदभाव नहीं करता। ये 'टाइमिंग' और 'स्टाइल' है जो पहले को 'ना' सुनवाता है, दूसरे को 'हां' 
एक दिन मैंने दोनों को अपने पास बुलवाया। उन्हें दो दोस्तों की एक कहानी सुनाई और कहा कि देखो कैसे इन दो दोस्तों ने एक पादरी से एक ही सवाल पर हां सुना और ना सुना।

कहानी इस तरह है-

दो दोस्त थे, दोनों एक बार एक चर्च के सामने से गुजर रहे थे। एक दोस्त ने दूसरे दोस्त से पूछा यार ये बताओ कि क्या हम प्रार्थना करते हुए सिगरेट पी सकते हैं?

दूसरे दोस्त ने कहा बिल्कुल नहीं। प्रभु को याद करते हुए सिगरेट को पीना पाप है।

पहला दोस्त नहीं माना, उसने कहा पादरी से पूछ कर आओ।

दोस्त चर्च के भीतर गया और उसने पादरी से पूछा फादर क्या हम प्रार्थना करते हुए सिगरेट पी सकते हैं?

पादरी ने कहा, नहीं मेरे बच्चे। प्रार्थना के दौरान सिगरेट नहीं पीनी चाहिए। ये पाप होगा।

पादरी की बात सुन कर वह दोस्त मुस्कुराया और बहार आ कर उसने कहा देखा मैंने क्या कहा था?

पहले दोस्त ने कहा, "रुको। अब मैं पूछता हूं।"

वह उसी पादरी के पास गया और उसने पूछा, फादर एक सवाल दिल में है, क्या मैं पूछ सकता हूं?

पादरी ने कहा, "हां, मेरे बच्चे, अवश्य पूछो।"

उसने पूछा, फादर क्या मैं सिगरेट पीते हुए प्रभु की प्रार्थना कर सकता हूं?

पादरी ने दोनों हाथ फैला कर कहा, हां मेरे बच्चे। प्रार्थना के लिए कोई समय नहीं होता। तुम जब चाहो प्रार्थना कर सकते हो, प्रभु को याद कर सकते हो।

मैंने कहानी यहीं रोकी और उन दोनों से कहा अब तुम्हें समझ में आ गया होगा कि पादरी ने किसी के साथ भेदभाव नहीं किया। उसने एक से कहा कि प्रार्थना के दौरान सिगरेट नहीं पीनी चाहिए, दूसरे से कहा कि सिगरेट पीते हुए प्रार्थना कर सकते हो। बात एक थी, मसला भी एक था। लेकिन नतीजे दो थे। कामयाबी के लिए जरुरी ये नहीं कि आप क्या कह रहे हैं, जरुरी होता है कि कैसे कह रहे हैं।

आज के लिए मेरी बात पूरी हो चुकी है, लेकिन मैं चलते-चलते इतना भर कहता चलूं कि सिगरेट पीने का उदाहरण मैंने सिर्फ उदारहण के लिए दिया है। मेरी समझ में सिगरेट कभी नहीं पीनी चाहिए, कहीं नहीं पीनी चाहिए। ये बात मैं कहीं सुन कर या पढ़ कर नहीं कह रहा। सिगरेट की वजह से मैंने अपने छोटे भाई को खोया है और बहुत बड़ी कीमत चुकाने के बाद ये अनुरोध कर रहा हूं कि आपमें से कोई अगर सिगरेट पीता हो तो अपने इस भाई के कहने से उसे छोड़ दें। आप बेशक इसलिए न छोड़ें कि आपको खुद से प्यार नहीं बल्कि इसीलिए छोड़ दें कि हमें आपसे बहुत प्यार है।

 

*****

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Way of expression Sanjay Sinha

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