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‘मित्र मिलन यात्रा’ : भाग 1
7/5/2011 2:57:32 AM
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- रवि तिवारी

क समय था जब मेरा कोई मित्र नहीं था तब मैं सोचा करता था मित्रों के साथ कैसा लगता है, कैसे अनुभव होतें हैं? तब मेरी दुनिया केवल मेरे उद्देश्य के लिए थी, अपने परिवार के लिए, अपने आफिस के लिए, बसपर जब एक दिन अचानक मैंने फेस बुक देखी तो ऐसे ही उसमें अपनी आई.डी. बना लीमैंने अपनी आई.डी. बना तो ली पर काफी समय तक उसको देखा ही नहींफिर जब मन में आया तो फेस बुक में मित्र बनाने शुरू किए। उस समय समझ में नहीं आता था क्या बात करूँ? कैसे बात करूँ? इस बात का पता ही नहीं चला कि मैं कैसे इसमें डूबता चला गया? शायद ठीक वैसे ही जैसे किसी से प्यार हो जाये और दिन रात उसके बारे में ही सोचें, सपने देखें, मधुर गाने सुनें-सुनाएँ।’

मेरे साथ भी ऐसा ही हुआमुझे भी प्यार हो गया और ऐसा प्यार कि बिना अपने प्यार से हंसी मजाक किए, बातें किए बिना न तो खाना ही अच्छा लगता था और न ही कहीं मन ही लगता थाप्यार में ऐसा आकंठ डूबा कि अपने प्यार के प्यार की जाने कितनी कविताएं भी लिख डालींसब कहने लगे क्या होगा इस बंदे का?

अब ऐसा है न जब प्यार होता है तो हमे किसी की बातें भी सुनाई नहीं देती न, केवल अपने प्यार की ही बातें सुनाई देतीं है नमेरी प्रेमिका का नाम है - फेस बुक

तो ऐसे ही समय बीतता गयाएक दिन मैंने सोचा क्यों न अपने मित्रों से मिलने जाया जा?
बस फिर क्या थामैंने प्रोग्राम बनाया और निकल पड़ादिन था 30 अप्रेल, समय दोपहर के एक बजेट्रेन में द्वितीय श्रेणी के वातानुकूलित शयन यान में मैं अपनी सीट पर थामेरी यात्रा रायपुर से दिल्ली के लिए थी

ट्रेन में बैठे बैठे मैंने अपने मित्रों को फोन से बताया मैं उनसे मिलने आ रहा हूँदूसरे दिन एक मई को सुबह लगभग दस बजे मैं दिल्ली पहुंचावहां स्टेशन पर मुझे लेने के लिए आये थे मेरे मित्र - हिमांशु नागपाल जीहिमांशु जी ने ही मुझे ये साफ्ट वेयर दिया जिससे मैं हिंदी लिख सकता हूँ, अंग्रेजी में टाइप करके। उनके साथ मैं पहुंचा इंडिया गेट’, जहाँ हर रविवार को प्रत्यंचा -सनातन संस्कृति के साथ विकास की ओरकी बैठक होती हैये फेस बुक का ग्रुप है जिसे हम बहुत पसंद करते हैंयहाँ पहुँचे तो देखा - लोवी भारद्वाज हमारा इंतजार कर रहे थेकुछ समय बाद रवि तिवारी जी’ ‘ओम जी भी पहुँचे हम सबने मिल कर अपने ग्रुप के उद्देशों पर चर्चा की  जानते हैं ये चर्चा चली लगभग चार घंटेइस बीच हमने चाय पी और चिप्स चने खाएफिर कुछ फोटो लीं अपने कैमरे में शाम हुई तो हम गए हिमांशु जी के घरसमय हुआ था शाम के सात बजे उनके घर हमने शाम को लंच कियाहिमांशु जी का छोटा सा परिवार, उनकी पत्नी और पुत्रएकदम करीने से सजाया हुआ सुन्दर सा घर जिसमे एक छोटा सा मंदिर राधा कृष्ण जी की सुन्दर प्रतिमाएंवहां खाना खा कर हम पहुंचे अपने होटल जहाँ हमने अपना सामान रखा था। अभी कुछ ही समय हुआ था कि लवी जी का फोन आया कि वह आ रहे हैं हम उनके साथ गए ताज रेस्टोरेंट, जहाँ उनके एक और मित्र के साथ बातें करते हुए रात का खाना खाया इस समय रात का एक बज रहा था। लवी जी के साथ जब हम उनकी मोटर साइकिल पर वापस होटल आ रहे थे तो वह इस तरह आस पास गुजरते स्थानों के बारे में बताते जा रहे थे कि लगा ये सब तो किसी किताब में भी नहीं होगासच में लवी जी के पास दिल्ली के हर हिस्से की इतनी सूक्ष्म से सूक्ष्म जानकारी है कि हम हैरान हो गए थेहोटल आ कर फिर लवी जी के साथ चर्चा का दौर चला जब मनपसंद बातें होती है तो पता ही नहीं चलता न समय कैसे बीत गया? ऐसा ही हमारे साथ भी हुआकब सुबह के चार बजे गए? अब लवी ने हमसे इजाजत ली और चले गए हमने भी कुछ घंटों की नींद लीइस तरह एक दिन पूरा हुआ 

जारी..........


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versha tiwari said :
यह पढ़कर तो ऐसा लग रहा है की हम किसी दूसरी दुनिया में आ गये है.....फेसबुक में भी इस तरह की दोस्ती होती है..लाजवाब .....इसके अगले अंक का इन्तजार है......बहुत ही सुन्दर वर्णन है रवि तिवारी जी..... धन्यवाद !!
7/6/2011 9:53:39 AM
shivam said :
वाह्ह्ह....बहुत सुन्दर इसके आगे क्या हुआ
7/8/2011 12:08:32 PM

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