- रवि
तिवारी
एक समय था जब मेरा कोई मित्र नहीं था तब मैं सोचा करता था – मित्रों के साथ कैसा लगता है, कैसे अनुभव होतें हैं? तब मेरी दुनिया केवल मेरे उद्देश्य के लिए थी, अपने परिवार के लिए, अपने आफिस के लिए, बस। पर जब एक दिन
अचानक मैंने फेस बुक देखी तो ऐसे ही उसमें अपनी आई.डी. बना ली। मैंने अपनी
आई.डी. बना तो ली पर काफी समय तक उसको देखा ही नहीं। फिर जब मन
में आया तो फेस बुक में मित्र बनाने शुरू किए। उस समय समझ में नहीं आता था क्या बात करूँ? कैसे बात
करूँ? इस बात का पता ही नहीं
चला कि मैं कैसे इसमें डूबता चला गया? शायद ठीक
वैसे ही जैसे ‘किसी से प्यार हो जाये और दिन रात उसके बारे में ही सोचें, सपने देखें, मधुर गाने सुनें-सुनाएँ।’
मेरे साथ भी
ऐसा ही हुआ। मुझे भी प्यार हो गया और ऐसा प्यार कि बिना अपने प्यार से हंसी मजाक किए, बातें किए बिना न तो खाना ही अच्छा लगता
था और न ही कहीं मन ही लगता था। प्यार में
ऐसा आकंठ डूबा कि अपने प्यार के प्यार की जाने कितनी कविताएं भी लिख डालीं। सब कहने लगे “क्या होगा इस
बंदे का?”
अब ऐसा है न
जब प्यार होता है तो हमे किसी की बातें भी सुनाई नहीं देती न, केवल अपने
प्यार की ही बातें सुनाई देतीं है न। मेरी प्रेमिका का नाम है
- फेस बुक।
तो ऐसे ही
समय बीतता गया। एक दिन मैंने सोचा क्यों न अपने मित्रों से मिलने जाया जाए?
बस फिर क्या था। मैंने
प्रोग्राम बनाया और निकल पड़ा। दिन था 30 अप्रेल, समय दोपहर के
एक बजे। ट्रेन में द्वितीय श्रेणी के वातानुकूलित
शयन यान में मैं अपनी सीट पर था। मेरी यात्रा रायपुर से
दिल्ली के लिए थी।
ट्रेन में
बैठे बैठे मैंने अपने मित्रों को फोन से बताया मैं उनसे मिलने आ रहा हूँ। दूसरे दिन एक
मई को सुबह लगभग दस बजे मैं दिल्ली पहुंचा। वहां स्टेशन
पर मुझे लेने के लिए आये थे मेरे मित्र - हिमांशु नागपाल जी। हिमांशु जी
ने ही मुझे ये साफ्ट वेयर दिया जिससे मैं हिंदी लिख सकता हूँ, अंग्रेजी में टाइप करके। उनके साथ मैं पहुंचा ‘इंडिया गेट’, जहाँ हर रविवार को “प्रत्यंचा -सनातन संस्कृति के साथ विकास की ओर” की बैठक होती
है। ये फेस बुक का ग्रुप है जिसे हम बहुत पसंद करते हैं। यहाँ पहुँचे
तो देखा - लोवी भारद्वाज हमारा इंतजार कर रहे थे। कुछ समय बाद ‘रवि तिवारी
जी’ ‘ओम जी’ भी पहुँचे हम सबने मिल
कर अपने ग्रुप के उद्देशों पर चर्चा की। जानते हैं ये चर्चा चली लगभग चार घंटे। इस बीच हमने
चाय पी और चिप्स व चने खाए। फिर कुछ फोटो
लीं अपने कैमरे में। शाम हुई तो हम गए
हिमांशु जी के घर। समय हुआ था शाम के सात बजे। उनके घर
हमने शाम को “लंच” किया। हिमांशु जी
का छोटा सा परिवार, उनकी पत्नी और पुत्र। एकदम करीने
से सजाया हुआ सुन्दर सा घर जिसमे एक छोटा सा मंदिर ‘राधा कृष्ण
जी’ की सुन्दर प्रतिमाएं। वहां खाना खा
कर हम पहुंचे अपने होटल। जहाँ हमने अपना सामान रखा था। अभी कुछ ही समय हुआ था कि लवी जी का फोन आया कि वह आ रहे हैं। हम उनके साथ गए। ताज
रेस्टोरेंट, जहाँ उनके एक और मित्र के साथ बातें करते हुए रात का खाना खाया। इस समय रात का एक बज रहा था। लवी जी के साथ जब हम उनकी
मोटर साइकिल पर वापस होटल आ रहे थे तो वह इस तरह आस
पास गुजरते स्थानों के बारे में बताते जा रहे थे कि लगा ये सब तो किसी किताब में
भी नहीं होगा। सच में लवी जी के पास दिल्ली के हर हिस्से की इतनी सूक्ष्म से सूक्ष्म जानकारी है कि हम हैरान हो गए थे। होटल आ कर
फिर लवी जी के साथ चर्चा का दौर चला। जब मनपसंद बातें होती
है तो पता ही नहीं चलता न समय कैसे बीत गया? ऐसा ही हमारे साथ भी हुआ। कब सुबह के
चार बजे
गए? अब लवी ने हमसे इजाजत ली
और चले गए। हमने भी कुछ घंटों की नींद ली। इस तरह एक
दिन पूरा हुआ।
जारी..........