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जार्ज एक याद - के. विक्रम राव
6/4/2015 9:17:01 PM
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जार्ज एक याद

- के. विक्रम राव

3 जून 2015 को बागी लोहियावादी जार्ज मैथ्यू फर्नांडिस पच्चासी के हो गये। पर उन्हें पता नहीं है। स्मृति लोप के कारण। जिस युवा समाजवादी द्वारा बन्द के एक ऐलान पर सदागतिमान, करोड़ की आबादी वाली मुंबई सुन्न पड़ जाती थी। जिस मजदूर पुरोधा के एक संकेत पर देश में रेल का चक्का जाम हो जाता था। जिस सत्तर वर्षीय रक्षामंत्री ने विश्व की उच्चतम रणभूमि कारगिल की अठारह बार यात्रा कर मियां परवेज मुशर्रफ को पटकनी दी थी। सरकारें बनाने-उलटने का दंभ भरने वाले कार्पोरेट बांकों को उनके सम्मेलन में ही जिस उद्योग मंत्री ने तानाशाह (इमर्जेंसी में) के सामने हड़बड़ाते हुये चूहे की संज्ञा दी, आज वही पुरुष सुध-बुध खोये, दक्षिण दिल्ली के पंचशील पार्क में क्लांत जीवन बसर कर रहा है। आस पडोस वाले पता भी नही बता पाते। लेकिन जार्ज के देश भर में फैले मित्र उन्हें याद करते हैं, नम आँखों से। विशेषकर श्रमिक नेता विजय नारायण (काशीवासी) और साहित्यकार कमलेश शुक्ल जो मेरे साथ तिहाड़ जेल में बड़ौदा डायनामाइट केस में जार्ज के 24 सह अभियुक्तों में रहे। अपने बावन वर्षों के सामीप्य पर आधारित स्मृतियां लिये एक सुहृद्र को याद करते मेरे इस लेख का मकसद यही है कि कुछ उन घटनाओं और बातों का चर्चा हो, जो अनजानी रहीं। काफी अचरज भरी रही।

मसलन यही जून का महीना था। चालीस साल बीते। इंदिरा गांधी का स्पष्ट हुकुम था। सी.बी.आई. के लिये कि भूमिगत जार्ज फर्नांडिस को जीवित नहीं पकड़ना है। वह इमर्जेंसी का दौर था। दो लाख विरोधी सीखचों के पीछे ढकेल दिये गये थे। कुछ ही जन नेता कैद से बचे थे। नानाजी देशमुख, कर्पूरी ठाकुर आदि। जार्ज की खोज सरगर्मी से थी। उस दिन (10 जून 1976 की) शाम को बड़ौदा जेल में हमें जेल अधीक्षक ने बताया कि कलकत्ता में जार्ज को पकड़ लिया गया है। तब तक मैं अभियुक्त नंबर एक था। मुकदमों का शीर्षक भारत सरकार बनाम मुलजिम विक्रम राव तथा अन्य था। फिर क्रम बदल गया। जार्ज का नाम मेरे ऊपर आ गया। तिहाड़ जेल में पहुँचने पर साथी विजय नारायण से जार्ज की गिरफ्तारी का सारा किस्सा पता चला। कलकत्ता के चौरंगी के पास सेंटपाल कैथेड्रल है। बड़ौदा, फिर दिल्ली से भागते हुये जार्ज ने कलकत्ता के चर्च में पनाह पाई। कभी तरुणाई में बंगलौर में पादरी का प्रशिक्षण ठुकराने वाले, धर्म को बकवास कहने वाले जार्ज ने अपने राजनेता मित्र रूडोल्फ राड्रिक्स की मदद से चर्च में कमरा पाया। रूडोल्फ को 1977 में जनता पार्टी सरकार ने राज्य सभा में एंग्लो-इंडियन प्रतिनिधि के तौर पर मनोनीत किया था। सभी राज्यों की पुलिस और सी.बी.आई. के टोहीजन शिकार को सूंघने में जुटे रहे। शिकंजा कसता गया। चर्च पर छापा पड़ा। पादरी विजयन ने जार्ज को छिपा रखा था। पुलिस को बताया कि उनका ईसाई अतिथि रह रहा है। पर पुलिसिया तहकीकात चालू रही। कमरे में ही एक छोटे से बक्से में एक रेलवे कार्ड मिला। वह आल-इंडिया रेलवेमेन्स फेडरेशन के अध्यक्ष का प्रथम एसी वाला कार्ड पास था। नाम लिखा था जार्ज फर्नांडिस। बस पुलिस टीम उछल पड़ी, मानो लाटरी खुल गई हो। तुरन्त प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क साधा गया। बेशकीमती कैदी का क्या किया जाए? उस रात जार्ज को गुपचुप रूसी फौजी जहाज इल्यूशिन से दिल्ली ले जाया गया। इंदिरा गांधी तब मास्को के दौरे पर थीं। उनसे फोन पर निर्देश लेने में समय लगा। इस बीच पादरी विजयन ने कलकत्ता में ब्रिटिश और जर्मन उपराजदूतावास को बता दिया कि जार्ज कैद हो गये हैं। खबर लंदन और बान पहुंची। ब्रिटिश प्रधान मंत्री जेम्स कैलाघन, जर्मन चांसलर विली ब्राण्ड तथा नार्वे के प्रधानमंत्री ओडवार नोर्डी जो ‘सोशलिस्ट इन्टर्नेशनल’ के नेता थे ने एक साथ इंदिरा गांधी को मास्को में फोन पर गंभीर परिणामों से आगाह किया यदि जार्ज का एनकाउन्टर कर दिया गया तो। वर्ना जार्ज की लाश तक न मिलती। गुमशुदा दिखा दिया जाता। वे बच गये और तिहाड़ जेल में रखे गये।

जार्ज की राजनेता वाली ओजस्विता तिहाड़ जेल में हमारे बड़े काम आयी। दशहरा का पर्व आया (अक्टूबर 1976)। तय हुआ कि अखण्ड मानस पाठ किया जाय। पूर्वी रेल यूनियन के नेता महेन्द्र नारायण वाजपेयी ने संचालन संभाला। मानस की प्रतियां भी आ गई। आसन साधा गया। मुश्किल आई कि हम हिन्दू जन केवल आधे-पौन घंटे की क्षमता वाले ही थे। कम से कम दो तीन घंटे का माद्दा केवल जार्ज में था। आखिर श्रमिक रैली, चुनावी सभाओं और लोकसभा में भाषण की आदत तो थी ही। तय हुआ कि जार्ज को पाठ के लिए चौबीस में से बारह घंटे चार दौर में आवंटित किये जाये। शेष हम बारह लोग एक एक घंटे तक दो किश्तों में पाठ करें। इसमें थे सर्वोदयी प्रभुदास पटवारी जो तमिलनाडु के राज्यपाल बने और इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री फिर बनते ही उन्हें बर्खास्त कर दिया था। स्वर्गीय वीरेन शाह थे। नामी गिरामी उद्योगपति और भाजपाई सांसद जो पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहे। दोहों के उच्चारण, लय तथा शुद्धता में कमलेश शुक्ल माहिर रहे। आखिर पूर्वी उत्तर प्रदेश के विप्र शिरोमणि हैं। विजय नारायण, महेन्द्र नारायण वाजपेयी, वकील जसवंत चौहान बड़े सहायक रहे। तभी भारतीय जनसंघ (तब भाजपा जन्मी नहीं थी) के विजय मल्होत्रा, मदनलाल खुराना और प्राणनाथ लेखी, अकाली दल के प्रकाश सिंह बादल आदि भी हमारे सत्रह नंबर वार्ड में यदाकदा आते थे। एक बार हम सब को भोजन करते समय ये राजनेता त्वदीयम् वस्तु गोविन्दम्उच्चारते देखकर अचरज में पड़ गये। वे समझते थे कि लोहिया के अनुयायी सब अनीश्वरवादी होते हैं।

लोहिया का चेला हो और विवादित व्यक्तित्व वाला न हो? नामुमकिन। भ्रष्टाचार के तीन भयंकर आरोप लगे थे जार्ज़ पर। कारगिल के शहीदों की लाषें लाने के लिये विदेश से अल्मूनियन के ताबूत का आयात किया गया। आरोप था कि इनकी खरीद में लूट हुई है। जार्ज को सोनिया गांधी ने कफन चोर कहा था। तहलका ने एक स्टिंग आपरेशन में शस्त्रों की खरीद में दलाली का आरोप दिखाया। इस्राइल से शस्त्र खरीदने में भी रिश्वत का आरोप लगाया गया। सब की सी.बी.आई. ने जांच की। रक्षा विशेषज्ञ ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जो बाद में राष्ट्रपति बने ने गवाही दी थी। सोनिया नीत यूपीए सरकार ने चार वर्ष तक जांच को टाला। अन्ततः सी.बी.आई. ने तीनों मामलों में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बता दिया कि जार्ज फर्नांडिस निरपराध हैं, दोषमुक्त करार दिये गये।

मुंबई की चौपाटी के बैंचो पर खुले आसमान तले जवानी बिता देने वाले विपन्न जार्ज फर्नांडिस का मुंबई महानगर पालिका के पार्षद से लोकसभा पहुँचने का किस्सा भी इतिहास का दस्तावेज है। मुंबई में चार लोकसभाई सीटों के चुनावों (1967) में सबसे ज्यादा दिलचस्प था दक्षिण मुंबई में। नेहरू मंत्रीमंडल के वरिष्ठ मंत्री, मुंबई के बेताज बादशाह, एस.के. पाटिल का सामना था नगर पार्षद और श्रमिक पुरोधा जार्ज फर्नांडिस से।

तीनों बार लोकसभा चुनाव में अपार बहुमत से जीतनेवाले सदाशिव कान्होजी (सदोबा) पाटिल चौथी बार दक्षिण मुंबई क्षेत्र से कांग्रेस के प्रत्याशी थे। इंदिरा गांधी मंत्रीमंडल में वे दमदार मंत्री थे। बात दिसम्बर 1966 की है। सदोबा पाटिल से मिलने हम संवाददाता प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में खबर की खोज में गये। उन्होंने विदेश नीति से लेकर खाद्यनीति तक अपने पाण्डित्यपूर्ण विचार बेलौस व्यक्त किये हालांकि ये विषय उनके केन्द्रीय मंत्रालय से नहीं जुड़े थे। बयान तब भाषणनुमा हो रहा था। तभी मैंने उनसे पूछा कि लोकसभा के चुनाव की घोषणा चन्द हफ्तों में होने वाली है। आप क्या फिर दक्षिण मुंबई से ही उम्मीदवारी करेंगे?

कुछ अचंभे के साथ वे बोले – और कहां से फिर?

मैंने पूछा कि यूँ तो आप अजेय हैं, पर इस बार लोहियावादी जार्ज फर्नांडिस आपको टक्कर देनेवाले हैं।

तनिक भौं सिकोड कर पाटिल बोले, कौन है यह फर्नांडिस? वही म्युनिसिपल पार्षद?

मेरा अगला वाक्य था, आप तो महाबली हैं। आपको तो बस आपसे भी बड़ा महाबली ही हरा सकता है।

कुछ मुदित मुद्रा में वे बोले, मुझे तो भगवान भी नहीं हरा सकते हैं।

उस जमाने में रिपोर्टरों के पास टेप रिकार्डर नहीं होता था। अतः जैसे ही बयान पर कोई विवाद उठता कि राजनेता साफ मुकर जाते थे और हम रिपोर्टरों की शामत आ जाती थी। इसीलिये बाहर निकल कर मैंने अपने संवाददाता साथियों से नोट्स मिलाये। तय हुआ कि हम सब की रपट का इन्ट्रो (प्रथम पैराग्राफ) होगा कि सादोबा पाटिल ने कहा कि भगवान भी उन्हें नही हरा सकता है। अगली सुबह मुंबई के सभी दैनिकों में यही सुर्खी थी। जार्ज, जिनका पार्षद कार्यालय मेरे आफिस टाइम्स आफ इंडिया भवन से लगा हुआ था, से मैं मिला और उन्हें हिन्दू भगवानों के अवतार के किस्से बताये। फिर कहा कि वह वामनावतार लें और विरोचनपुत्र दैत्यराज महाबली बलि (पाटिल) से भिड़ें। जार्ज तब सैंतीस वर्ष के थे। श्रमिक पुरोधा थे। तय कर लिया सब साथियों ने कि पाटिल को टक्कर दी जाये। यह कहानी थी ‘दिये की और तूफान की’। अभियान सूत्र मात्र एक वाक्य था – पाटिल कहते हैं कि उन्हें भगवान भी नहीं हरा सकता है।

फिर इसके बाद सात किश्तों में पोस्टर निकले। पहला था, क्या पाटिल को साक्षात परमेश्वर भी नहीं हरा सकते? और अन्तिम पोस्टर था, अब मुकाबला पाटिल बनाम आमजन में है।

जब मतदान के परिणाम आये तो जार्ज को 48.5 प्रतिशत वोट मिले। परमशक्तिशाली, महाबलवान, अहंकारी, अजेय एस.के. पाटिल चालीस हजार वोटों से हारे।

एक बात जार्ज के बारे में और। समाजवादी हो और आतिशी न हो? यह तो उनकी फितरत है। जार्ज के रक्षामंत्री आवास (तीन कृष्ण मेनन मर्जा) में बर्मा के विद्रोहियों का दफ्तर खोल दिया। ये लोग फौजी तानाशाहों के विरूद्ध मोर्चा खोले थे। तिब्बत में दलाई लामा की घर वापसी का समर्थन और उनके अप्रवासियों को धन-मन से जार्ज मदद करते रहे। अंडमान के समीप भारतीय नौसेना ने शस्त्रों से लदे जहाज पकडे़ जो अराकान पर्वत के मुस्लिम विद्रोहियों के लिये लाये जा रहे थे। जार्ज ने जलसेना कमांडर को आदेश दिया कि ये जहाज रोके न जायें।

श्रीलंका के तमिल विद्रोहियों ने अपने दिवंगत नेता वी. प्रभाकरण के बाद जार्ज को अपना सबसे निकट का हमदर्द माना था। सच्चा समाजवादी दुनिया के हर कोने में हो रहे प्रत्येक विप्लव, विद्रोह, क्रान्ति, उथल-पुथल, संघर्ष और गदर का समर्थक होता है। क्योंकि उससे व्यवस्था बदलती है, सुधरती है। जार्ज सदा बदलाव के पक्षधर रहे। इसलिए आज भी आम जन के वे मनपसन्द राजनेता हैं।

 



के. विक्रम राव

 

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George a memoir – K. Vikramrav

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वत्स कुमार said :
गरीबों के साथी जार्ज के जन्म दिन पर शत शत बधाई. चिरायु हों. वत्स कुमार
6/5/2015 12:29:41 PM
Amrit Lal said :
I still remember those days when George defeated SK Patil. later he lead the Railway strike when large no of Railway employees were arrested during the strike period. Hats off to you George, long live George. - Amrit Lal
6/8/2015 7:57:36 AM

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