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बुनियाद – फिर शुरू हो रहा है विभाजन की पृष्ठभूमि पर बना धारावाहिक
7/24/2013 8:09:16 PM
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- विशेष प्रतिनिधि

पने समय के लोकप्रिय धारावाहिक ‘बुनियाद‘ को दूरदर्शन कल से पुनर्प्रसारित करने जा रहा है। 27 वर्ष पूर्व, 1986 में विभाजन की पृष्ठभूमि पर बना यह धारावाहिक जब आरंभ हुया तब उस समय अनेक परिवारों के जीवन का यह विशेष हिस्सा बन गया था। उल्लेखनीय है कि मनोहर श्याम जोशी लिखित कहानी पर बना यह धारावाहिक न केवल भारत में बल्कि पाकिस्तान में भी बहुत लोकप्रिय हुआ था।

विभाजन के 66 वर्षों के बाद की विभीषिका से गुजरी उस पीढ़ी के लोगों की संख्या अब नगण्य ही होगी। परंतु भारत पाक संबंधों को देखते हुए 'बुनियाद' की कहानी ने अपनी प्रासंगिकता नहीं खोई है। अब भी यह धारावाहिक दर्शकों के एक बड़े वर्ग को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल होगा।

‘बुनियाद‘ के लोकप्रिय होने के कई कारण थे। उस समय कोई अन्य निजी चैनल नहीं था। दूरदर्शन के अत्यंत लोकप्रिय धारावाहिक ‘हम लोग’ के ख़त्म होने के कारण लोग कुछ अच्छा देखना चाहते थे। ऐसे समय में कुछ ही महीने बाद जब बुनियाद' का प्रसारण हुआ तो लोगों ने उसे हाथों हाथ लिया था। हर मंगलवार और शनिवार जब 'बुनियाद' का प्रसारण होता था तब भारत के अलावा पाकिस्तान में लाहौर की सड़कें भी सूनी हो जाती थीं।

लाहौर में रहने वाले मास्टर हवेली राम, लाजो जी, वीरांवाली, लाला रलिया राम, भूषण, पुत्र रोशन पुत्र, वृषभान जयभूषण उर्फ़ जेबी, मंगला जेसे अनेक पात्रों में लोगों ने अपनीरमेशसिप्पी-0001.jpg या अपने नाती रिश्तेदारों की झलक देखी थी और देश के विभाजन के दर्द से जूझने वाले व हार ना मानने वाले, संघर्षशील इन पात्रों के सुख-दु:ख में अपना सुख-दु:ख ढूंढने वाले दर्शकों को उनमें अपनी छवि देख कर बड़ा ही आत्मसंतोष सा होता था। ‘शोले’ के प्रसिद्ध निर्देशक रमेश सिप्पी ने ‘बुनियाद’ को निर्देशित किया था।'बुनियाद' की कहानी का आरंभ विभाजन से पहले के लाहौर से हुआ। जी हां वही लाहौर जिसके बारे में कहा जाता था कि ‘जिस लाहौर नहीं वेख्या, ओह जमिया ही नहीं’। वही लाहौर जहां की जिंदगी बेलौस थी, बेफिक्र थी। लाहौर की ‘गली बिच्छों वाली’ में रहने वाले मास्टर आलोकनाथ-0001.jpgहवेलीराम (आलोक नाथ) और उनके परिवार की कहानी है यह। आजादी की लड़ाई के सिपाही मास्टर हवेली राम अपने उसूलों के पक्के थे और पक्के देशभक्त भी। दूसरी ओर उनके पिता लाला गेंदामल (सुधीर पांडे) अंग्रेजों के पक्षधर थे। देशभक्ति के साथ-साथ मास्टर जी व लाजो जी (अनीता कँवर) की प्रेम कहानी भी इस का विशेष आकर्षण था। मास्टर जी लाजोको पढ़ाने जाते थे। वह मन ही मन उसे पसंद भी करने लगे थे। पर अपने प्यार को प्रकट नहीं कर पाए। अंतत: लाजो की शादी बड़ी उम्र के व्यक्ति से हो जाती है।

सुधीरपांडे-लालागेंदामॉल.jpg दिल का दौरा पड़ जाने से शादी की रात को ही लाजो के पति की मृत्यु हो जाती है। मास्टर जी अपने परिवार और समाज के कड़े विरोध के बावजूद विधवा लाजो से शादी कर लेते हैं। कुछ दिन बीतने के बाद देश के विभाजन का समाचार आता है। देश विभाजन से ठीक पहले लाहौर में हुए दंगे मास्टर हवेलीराम के आदर्शों की बुनियाद को हिला कर रख देते हैं। परिवार पर मुसीबतों के पहाड़ टूट पड़ते हैं। इन्ही दंगो में अचानक मास्टर हवेली राम लापता हो जाते हैं। विभाजन के बाद यह परिवार घर से बेघर हो जाता है। मित्र संबंधी सब छूट जाते हैं। पीछे रह जाती हैं तो बस यादें। इन्हीं यादों को लेकर हवेली राम का पूरा परिवार दिल्ली के एक शरणार्थी कैंप में पहुंच जाता है। इसके बाद आरंभ होती है संघर्ष की वह कहानी जो उन दिनों भारत में आए अधिकांश शरणार्थी परिवारों की अपनी ही कहानी थी।

सौ से अधिक कड़ियों तक चलने वाला 'बुनियाद', उस समय का सबसे लंबा चलने वाला धारावाहिक था। यद्यपि बाद में आये अनेक धारावाहिकों ने इसके कीर्तिमान को तोड़ा लेकिन 'बुनियाद', जेसी छाप शायद ही कोई धारावाहिक छोड़ पाए।

धारावाहिक के लेखक मनोहर श्याम जोशी आज हमारे बीच नहीं रहे। मनोहरश्याम्जोशी-0001.jpgधारावाहिक के लिए प्रोफेसर पुष्पेश पंत ने उनकी काफी सहायता की थी। हिंदी की सुप्रसिद्ध लेखिका कृष्णा सोबती का भी इस धारावाहिक में अमूल्य योगदान रहा था। खुद मनोहर श्याम जोशी ने स्वयं इसका उल्लेख अपनी किताब बुनियाद में किया था। रमेश सिप्पी ने उस दौर की घटनाओं को प्रस्तुत करने में तकनीकी तौर पर भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी। रमेश सिप्पी ने इस धारावाहिक का निर्माण फिल्म निर्माण की तरह ही किया था। सिप्पी ने बीस से भी ज्यादा कड़ियों का फिल्मांकन किया था। बाद की कड़ियों का निर्देशन ज्योति सरूप ने किया था। बुनियाद' की शूटिंग के दौरान निर्देशक रमेश सिप्पी और ‘वीरावांली’ बनी अभिनेत्री किरण जुनेजा में हुई मित्रता बाद में शादी में परिवर्तित हो गई।

‘बुनियाद' के प्रदर्शन के दौरान अनेक रोचक घटनाएं भी हुईं। कहानी में दिखाया जाता है कि वृषभान के बेटे जयभूषण उर्फ़ जेबी जेबी को ब्लड कैंसर हो जाता है। तब टाटा मेमोरियल कैंसर अस्पताल के एक डाक्टर ने मनोहर श्याम जोशी को एक पत्र लिख कर कहां कि जेबी को मरते हुए ना दिखाया जाए। डाक्टर का मानना था कि ऐसा होने से कैंसर के रोगियों में गलत संदेश जाएगा और वे हिम्मत हार बैठेंगे। परंतु मनोहर श्याम जोशी ने उक्त अनुरोध नहीं माना और जेवी की मौत के दृश्यों ने देश भर के दर्शकों की आंखे नम कर दी थीं।

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Buniyad’ – A serial on the background of  partition again being telecasted

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