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बॉम्बे वेलवेट : धीमी कहानी पर अभिनय लाजवाब - सिद्धार्थ शंकर गौतम
5/26/2015 3:38:25 PM
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फिल्म समीक्षा: बॉम्बे वेलवेट

धीमी कहानी पर अभिनय लाजवाब


- सिद्धार्थ शंकर गौतम

हिंदी सिनेमा में प्रयोगधर्मिता की जिस तीव्रता को परदे पर उतारने की कला से निर्देशक अनुराग कश्यप जाने जाते हैं, बॉम्बे वेलवेट में उन्होंने इसे एक नई ऊंचाई पर पहुँचाया है। गैंग्स ऑफ़ वासेपुर जैसी डार्क हॉर्स फिल्म बनाने वाले अनुराग कश्यप ने अपनी ताज़ा BombayVelvet.jpgप्रस्तुति में बॉम्बे (आज का मुंबई) के उस कालखण्ड का बखूबी वर्णन किया है जो एक ओर तो महानगर बनने के लिए अंगड़ाई ले रहा है वहीँ मज़दूर वर्ग पूंजीपतियों के कुचक्र में खुद को असहाय पाता है। गोयाकि औद्योगिक क्रांति हमेशा मज़दूर वर्ग की लाशों के ढेर से आती है। बॉम्बे वेलवेट की कहानी इतिहासकार ज्ञान प्रकाश की पुस्तक 'मुंबई फेबल्स' से प्रेरित है। फिल्म की कहानी पर लंबे समय से काम कर रहे अनुराग कश्यप हालांकि 'मुंबई फेबल्स' को हूबहू परदे पर उतारने में नाकामयाब रहे हैं। लचर कहानी और स्क्रीनप्ले की कुछ खामियां इस फिल्म को मास से दूर करती हैं। हाँ, लीक से हटकर अलग देखने की चाह रखने वाले के लिए अनुराग कश्यप का यह सिनेमा बरसों याद किया जाएगा। फिल्म की कहानी भारत-पाकिस्तान के बँटबारे से शुरू होती है और 1969 के बॉम्बे तक आते-आते इसमें कई परिवर्तन होते हैं। मसलन, बॉम्बे में अब ट्राम नहीं चलती क्योंकि शहर के मेयर जिसकी देश के प्रधानमंत्री तक पहुँच है, की गाड़ी ट्राम की वजह से लेट हो गई थी। अंग्रेज़ों के भारत छोड़ने के बाद भी उस दशक का बॉम्बे कथित अभिजात्य अंग्रेजी वर्ग की लानत-मलानत में लगा है। अंग्रेज़ों को शराब मिलती है लेकिन बॉम्बे के लोगों के पास शराब पीने के लिए परमिट ज़रूरी है। यह ऐसा चित्रण है मानो देश को आज़ादी तो मिल गई हो लेकिन मानसिकता अभी भी गुलाम हो। जिस मेयर की वजह से बॉम्बे की ट्राम बंद हुई वह अपराधियों और पुलिस प्रशासन के बड़े अधिकारियों के गठजोड़ से बॉम्बे की बेशुमार ज़मीनों पर कब्ज़ा चाहता है ताकि भविष्य में चमकते बॉम्बे पर उसके अर्थ-तंत्र का राज चल सके। फिल्म की कहानी में कई ट्विस्ट हैं जो धोखे, छल-कपट और सियासती दांव-पेंच से दर्शकों को रूबरू करवाते हैं। नायक या यों कहें कि उस दौर का अति महत्वाकांक्षी युवक, जिसके अंदर सिर्फ मैं की भावना है, अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहता है और इसी जद्दोजहद में फिल्म आगे बढ़ती है।

 

कहानी

जॉनी बलराज (रणवीर कपूर) सियालकोट का रहने वाला है और बँटबारे के बाद मुंबई आ जाता है। उसका मुंबई आना भी इत्तेफाक है क्योंकि पाकिस्तान से दिल्ली आने वाली ट्रेनों में लोगों को काटा जा रहा था। अपनी मुँहबोली माँ के साथ वेश्यालय में रहने को मजबूर जॉनी जिंदगी को पटरी पर लाने की कोशिश करता है। इसी दौरान उसकी मुलाक़ात अपराध की दुनिया के बेताज बादशाह कैजाद खम्बाटा (करण जौहर) से होती है और उसकी ज़िंदगी का मकसद बदल जाता है। खम्बाटा जॉनी को बॉम्बे वेलवेट नाम का क्लब बनवाकर देता है जहाँ अभिजात्य वर्ग अपनी सामाजिक वर्जनाओं को तोड़कर खुद को पाश्चात्य संस्कृति के करीब पाता है। यहीं जॉनी की मुलाक़ात रोज़ी (अनुष्का शर्मा) से होती है और दोनों एक-दूसरे से प्यार करने लगते हैं। दोनों के अपने अतीत हैं जो धीरे-धीरे सामने आते हैं और इसी बीच जॉनी और खम्बाटा में हितों के टकराव का मामला सामने आता है जिससे फिल्म रोचक होती जाती है। आगे क्या होता है यह जानने के लिए आपको सिनेमाघरों का रुख करना पड़ेगा।

 

अभिनय

जॉनी बलराज के रोल में रणबीर कपूर ने खुद को कपूर खानदान की विरासत को आगे ले जाने का माद्दा दिखाया है। फिल्म का हीरो होने के साथ ही रणबीर का ग्रे करेक्टर भी बखूबी सामने आया है। बॉक्सिंग के शौक़ीन युवा के चलते उन्होंने गुस्से और कुंठा को नए आयाम दिए हैं गोयाकि नायक अपना सारा गुस्सा बॉक्सिंग करके निकाल चाहता है लेकिन कहीं न कहीं कसर बाकी रह जाती है। रणबीर कपूर यक़ीनन बॉक्स ऑफिस के लाड़ले लड़के हैं जिनका अपना दर्शक वर्ग है और इस फिल्म में वह उन्हें देखकर निराश नहीं होगा। अनुष्का शर्मा का किरदार फिल्म की कहानी आगे बढ़ाने में सहायक है किन्तु कैफ़े सिंगर के रोल में अनुष्का कुछ जमी नहीं। गाने गाते समय उनके हाव-भाव खीज पैदा करते हैं। मनीष शर्मा ने जिम्मी मिस्त्री के रूप में उस दौर की पत्रकारिता और उसके मूल्यों की जिया है। कैसे एक पत्रकार दोस्ती, भय, अर्थतंत्र की होड़ से दूर जनता को जागरुक करने में लगा है, यह उस दौर की पत्रकारिता सिखाती है। फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी करण जौहर हैं जिन्होंने खलनायकी को नए आयाम दिए हैं। साधारण और मासूम चेहरा भी भाव-भंगिमाओं से कैसे क्रूर दिख सकता है, यह करण को देखकर एहसास हो गया। करण को अब अभिनय में भी हाथ आजमाना चाहिए। 

 

निर्देशन

अनुराग कश्यप निःसंदेह बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने आज की पीढ़ी को उस दौर का बॉम्बे दिखाया जो शैशव काल से जवान होने चला था। हालांकि इस तरह की फिल्मों का एक ख़ास दर्शक वर्ग होता है मगर ये फिल्में मील का पत्थर साबित होती हैं। बॉम्बे वेलवेट कमजोरी के बावजूद सुखद अनुभूति का अहसास करवाती है। २ घंटे की फिल्म में दर्शक किरदारों से खुद को जुड़ा पाता है। गीत-संगीत की बात करें तो अमित त्रिवेदी ने फिल्म के मूड के हिसाब से संगीत दिया है। फिल्म के गानों में गीतादत्त के होने का आभास होता है। 'जाता कहाँ है दीवाने' और 'मोहब्बत बुरी बीमारी' आपको पांच दशक पहले के संगीत की याद दिलाएंगे।

 

देखें या नहीं

फिल्म को रणबीर कपूर, करण जौहर, सत्यदीप मिश्रा, के के मेनन, मनीष शर्मा, अनुष्का शर्मा जैसे दिग्गज कलाकारों के अभिनव कौशल के लिए देखा जाना चाहिए। वहीँ यदि आप 50-60 के दशक के बॉम्बे के आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक पक्ष से रूबरू होना चाहते हैं तो फिल्म मिस न करें। फिल्म को सेंसर बोर्ड ने यू/ए सर्टिफिकेट दिया है किन्तु परिवार के साथ जाने वाले दर्शक कुछेक दृश्यों में असहजता महसूस कर सकते हैं। कुल मिलाकर फिल्म धीमी किन्तु ताजा हवा के झोंके की मानिंद है जिसे बरसों याद रखा जाएगा।

 

निर्देशक : अनुराग कश्यप 

प्रमुख कलाकार : रणबीर कपूर, अनुष्का शर्मा, करण जौहर, विवान शाह, के के मेनन, मनीष चौधरी, इरफ़ान  खान, रेमो फर्नांडेज, सत्यदीप मिश्रा और सिद्धार्थ बसु

संगीत : अमित त्रिवेदी

स्टार रेटिंग : 4

 

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सिद्धार्थ शंकर गौतम

*****

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  Bombay Velvet : Slow story but top acting – Siddarth Shankar Gautam

,



 

अर्जुन मालिक said :
बहुत अच्छी प्रस्तुति है. - अर्जुन मालिक
5/27/2015 4:57:28 PM

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