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खतरे में हैं पहाड़ और नदियां - सर्जना शर्मा
6/20/2014 9:25:00 PM
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- सर्जना शर्मा

त्तराखंड यानि देवभूमि के कुमांऊं क्षेत्र से हो कर लौटी हूं। रानीखेत, अलमोड़ा दूनागिरी चितई आदि स्थानों पर गयी। निसंदेह कुमाऊं बहुत सुंदर है प्रकृति ने जी भर कर इस क्षेत्र पर अपना खजाना लुटाया है। लेकिन प्राकृतिक सौंदर्य यहां से गायब होता जा रहा है। जंगल और पहाड़ काट कर होटल, लॉज और गेस्ट हाऊस बनाए जा रहे हैं। यहां भी कंक्रीट के जंगल उगते जा रहे हैं, बहुमंज़िला इमारते बन रही हैं। पेड़ कटने के कारण हवा में ठंडक ज्यादा नहीं है। अलमोड़ा का तापमान 38 -39 डिग्री के आसपास रहता है। रास्ते भर हमने लोगों को धूप का छाता लेकर जाते देखा। पूरे इलाके में पानी की भारी KhatrMen-Intro.JPGकिल्लत है। नदियां सूख रही हैं, पानी का स्तर कम हो गया है। लोगों को घर के काम और पीने के पानी के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। होटल, लॉज और कॉटेज मालिक पानी के टैंकर मंगवाते हैं। 4000 लीटर पानी का टैंकर 2500 रूपए में मिलता है। लेकिन आम आदमी सारा दिन पानी भरता है। भीमताल से लेकर रानी खेत और अल्मोड़ा के रास्ते में महिलाएं, लड़कियां सिर पर प्लास्टिक के बड़े-बड़े कैन रख कर जाती मिलीं। मन में बहुत से सवाल पैदा हुए। मुझे लगा कि पहाड़ों की इस हालत के लिए हम मैदानी लोग बहुत हद तक ज़िम्मेदार हैं। हम पहाड़ों में मौज मस्ती करने जाते हैं, प्रकृति से अपना नाता जोड़ने नहीं जाते। अब पहाड़ों की आबो हवा में भी प्रदूषण है। अब वहां इतनी गाड़ियां चलती हैं कि आबो हवा में ज़हर घुलता रहता है। पर्यटक पहाड़ों में ठंडी हवा का आनंद लेने जाते हैं लेकिन पहाड़ों को बदले में गंदगी देकर आते हैं। रास्ते भर आपको सड़कों के किनारे बीयर की खाली बोतलें, कोल्ड ड्रिंक्स की खाली बोतलें, चिप्स, नमकीन के खाली पैकेट नज़र आएंगें। हम पढे लिखे लोग इतना भी ध्यान नहीं रखते कि कूड़ा सड़कों पर ना डाल कर उसे कूड़े दान में डालें।

हमारी संस्कृति प्रकृति के साथ सह अस्तित्व की रही है। वेदों उपनिषदों में धरती को माता और आकाश को पिता के समान माना गया है। नदियों, वायु, अग्नि की देवी देवता मान कर पूजा की गयी है। जो प्रकृति हमें इतना कुछ देती है क्या उसके प्रति हमारा कोई कर्तव्य नहीं है? अगर हम इसी तरह मनमानी करते रहे तो एक दिन पहाड़ों के आनंद से वंचित हो जाएंगें। दरअसल हम प्रकृति की उपासक अपनी प्राचीन संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं। पर्यावरण संरक्षण को लेकर पश्चिमी देश आज जो मुहिम चला रहे हैं उसे हमारे ऋषि मुनियों ने तो हज़ारों वर्ष पहले ही समझ लिया था। धरती को मां के समान पूजा गया है। अथर्व वेद के भूमि सूक्तों में धरती की एक से बढ़ कर एक वंदना है। कहा गया है -  ‘माता भूमि पुत्रेहं पृथिव्यां’ – अर्थात धरती माता है और मैं इसका पुत्र हूं। एक सूक्त में धरती से अनुरोध किया गया है कि – ‘सा नो भूमिर्विसृजतां माता पुत्रय में पय’ यानि भूमि मेरे लिए वैसे ही दूध की धारा प्रवाहित करे जैसे मां अपने नन्हें शिशु के लिए करती है। धरती के साथ इतना सुंदर इतना प्यारा इतना भावात्मक नाता। और हम भूल रहे हैं कि इसी धरती पर सुंदर पहाड़, झरने, नदियां, पेड़ पौधे, फल फूल औऱ औषधियां हैं। यदि हम मां के प्रति अपना धर्म नहीं निभा पा रहे तो मां से कैसे उम्मीद रखें कि वह हमारे लिए सदा दूध की धारा बहाती रहेगी।

हमें चेतना ही होगा। अब भी नहीं चेते तो परिणाम बहुत बुरे होंगें और हो ही रहे हैं। पहाड़ो में तापमान बढ़ता जा रहा है। जंगल कटते जा रहे हैं नदियों का पानी कम हो रहा है। जब पहाड़ो में ये सब ही नहीं रहेगा तो हम गर्मी से निजात पाने जायेंगें कहां? केदारनाथ घाटी में पिछले साल हुई भारी तबाही से भी हमने कोई सबक नहीं लिया। सरकार भी अपनी कोई पर्यटन नीति नहीं बनाती। इमारतें बनाने के कड़े नियम हैं ही नहीं। अंधाधुंध बहुमंज़िली इमारतें बन रही हैं। हमें भूटान जैसे देश से सबक लेना चाहिए।  वहां पर्यटन नीति बहुत सख्त है। हर ऐरा गैरा भूटान यात्रा नहीं कर सकता। हमारी भूटान यात्रा के दौरान हमने भूटान के राजा खेसर जिग्में वांगचुक से बात की तो उन्होने बताया कि उन्हें बैकपैकर टूरिस्ट नहीं चाहिए। गंभीर प्रकृति, पर्यावरण औऱ हैरिटेज प्रेमी पर्यटक चाहिए। वहां एक दिन रुकने की सैंकड़ों डॉलर फीस देनी पड़ती है। इसलिए वहां गंभीर किस्म के पर्यटक ही जाते हैं। वहां का प्राकृतिक सौंदर्य देखने लायक है। इमारतें भूटानी वास्तुशैली के हिसाब से बनी हैं। कानून बहुत सख्त है, सरकारी औऱ गैर सरकारी इमारते भूटानी शैली में ही बनायी जायेंगी। चार मंज़िल से ज्यादा की इमारत बनाने की अनुमति नहीं है। भूटान भी हिमालयन रेंज में बसा है। हिमालयन वास्तु शैली इस तरह से विकसित की गयी कि प्राकृतिक आपदाओं में जान माल का ज्यादा नुकसान ना हो। लेकिन भारत के पहाड़ी इलाकों से हिमालयन वास्तुशैली लगभग गायब हो चुकी है। क्या हमें भूटान की तरह पर्यटन नीति और भवन निर्माण नीति नहीं बनानी चाहिए। क्या हम सब लोगों को एक पर्यटक के रूप में जिम्मेदार नहीं होना चाहिए, ताकि कल हमारी भावी पीढ़ी भी पहाड़ों का आनंद ले सके। मसूरी, मनाली, डलहौज़ी, शिमला आदि पहले ही बहुत कमर्शियल हो चुके हैं।

 

सर्जना शर्मा

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Mountains and Rivers are in dandger – Sarjana Sharma

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