Font Sign In / Register
शब्दकोश Dictionary
अंग्रेज़ी-हिन्दी शब्द अनुवाद
 
www.swargvibha.tk
 
Opinion Poll
No-ball incident has made our players more aggressive, says M S Dhoni. Do you agree?
Yes
No
Can't Say
Please answer this simple math question 6 + 1 = 7
   
 
Social Media
 
 
 
 
 
Email
बुझने न दें दीप दोस्ती का – संजय सिन्हा
10/23/2014 2:10:49 PM
Post Your Review

- संजय सिन्हा

चपन में जब क्रिकेट, कबड्डी, गिल्ली डंडा, चोर-सिपाही, डेंगा पानी, पिट्टो जैसे खेल खेलते हुए किसी बच्चे से मेरी लड़ाई हो जाती और मैं उस बच्चे से झगड़ा कर घर चला आता तो मां कहती थी कि दोस्ती करने में तुम्हें सौ बार सोचना चाहिए और दोस्ती तोड़ने में हजार बार। मां तब ऐसी बात क्यों कहती थी, मेरी समझ में ये नहीं आता था। मैं मन ही मन बदले की आग में जलता था और जिस बच्चे के साथ सुबह तक गलबहियां कर घूमता नजर आता था, वही बच्चा शाम को मेरी निगाह में गब्बर सिंह हुआ करता था। मेरे मन में तब ठाकुर से कहीं ज्यादा बदले की भावना हुआ करती थी और मुझे यकीन है कि उसके मन में भी ऐसी ही भावना आती ही होगी।

बचपन के ऐसे झगड़े के बाद कइयों से अगले दिन दोस्ती भी हो जाती थी, कइयों से जन्म जन्मांतर के लिए झगड़े भी हो गए। खैर जो भी हो। ये तय है कि जब हमारा झगड़ा हो जाता था, तब मन में कोफ्त बहुत होती थी। मन इतना अशांत हो जाता था कि दिल में आता था कि पिताजी से कहूंगा कि आप प्लीज इस शहर को ही छोड़ दें। फिर ये भी सोचता कि ऐसे झगड़े होते रहे तो पिताजी बेचारे कितनी बार शहर बदलते रहेंगे?

धीरे-धीरे मैं बड़ा होता गया, और मां के इस कहे पर खूब मंथन करने लगा कि रिश्तों को जोड़ने में सौ बार सोचने और तोड़ने में हजार बार सोचने की बात मां क्यों कहती है? मां क्यों कहती है कि रिश्ते यूं ही नहीं बनते, हर रिश्ता हमारा प्रारब्ध होता है।

मां कहती थी कि हमारा पडो़सी कौन होगा ये हम तय नहीं करते। तुम्हारे स्कूल में कौन सा बच्चा तुम्हारी क्लास में तुम्हारे साथ होगा ये भी तुम तय नहीं करते। तब तो मैं नहीं समझता था कि वो ऐसा क्यों कहती है कि भविष्य में तुम्हारा शिक्षक, तुम्हारा बॉस ये सब तुम नहीं तय कर पाओगे। ये सब तुम्हारे प्रारब्ध से तय होंगे। इसलिए रिश्तों को जीने और निभाने की आदत होनी चाहिए।

पड़ोसी से दोस्ती रखोगे तो तुम्हारी सुबह सुखद होगी। दुश्मनी रखोगे तो हर सुबह कोफ्त होगी। जब मार्क जुकरबर्ग का जन्म नहीं हुआ था, तब वो मुझसे कहती थी कि कोई जरुरी नहीं कि भविष्य में फेसबुक पर जो भी तुम्हें फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजे उसे तुम स्वीकार कर ही लो। तुम चाहो तो उसके प्रोफाइल पर जाओ और उसके बारे में पता करो। तुम चाहो तो उससे रिश्ता जोड़ने से पहले सौ बार सोच लो। लेकिन एक बार दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया तो फिर उसे अपनी ओर से पूरी शिद्दत से निभाने की कोशिश करना। मां को पता नहीं कैसे इल्म था कि मैं बेतार के संसार में रोज नए-नए रिश्ते बनाता फिरुंगा क्योंकि वो मुझसे कहा करती थी कि रिश्तों को जीना आना चाहिए। जो रिश्तों को ठीक से नहीं जीना जानते उनके लिए जिंदगी का साथ निभाना ही मुश्किल होता है।

और मैं देखता था कि मां पता नहीं कैसे दादी, बुआ, मामी, फूफा, मामा, मॉसी, चाची, चाचा सबसे बहुत प्यार से रिश्ते निभाती थी। यहां तक कि हमारे पड़ोसी भी हमारे लिए रिश्तेदार ही हुआ करते थे। पिताजी के दफ्तर के लोग भी हमें रिश्तेदार लगा करते थे। और रिश्तों की इन कड़ियों को मां गजब तरीके से मेंटेन करती थी।

तब हम छोटे शहर में हुआ करते थे, इसलिए पड़ोसी से निभाना जितना आसान था, उतना ही मुश्किल भी था। दोनों घर एक दूसरे के बारे में धीरे-धीरे सबकुछ जान लेते थे। यहां तक ये भी आज किसके घर क्या पका।

अपने जीवन के आखिरी दिनों में जब मां बहुत बीमार हो गई थी तब हम अपने ननिहाल में शिफ्ट हो गए थे। ननिहाल मतलब नानी के घर। मां की मां नहीं थी। मां के पिताजी भी नहीं थे। मां की तीन चाचियां थीं। तीन चाचा थे। ढेर सारी चचेरी बहनें थीं। एक अकेला भाई था जो मेरे मामा थे और वो मध्य प्रदेश में आईपीएस अधिकारी थे। मुझे भविष्य में उन्हीं के पास आना था। पर अभी तो हम अपनी ढेर सारी नानियों, नानाओं, मॉसियों के घर चले गए थे। हमारे जाने के बाद सात महीने मां को इस संसार में और रहना था। लेकिन उन सात महीनों में मैंने घर में गजब की एकता, उत्साह और प्यार देखा।

सारी नानियां मां को घेर कर बैठती थीं। सारी नानियां आपस में एक दूसरे से खूब प्यार से रहतीं। तीनों नाना एक साथ नाश्ता करते, खाना खाते और उस बड़ी सी कोठी में खूब रौनक हुआ करती। मां पूरे घर के केंद्र में होती। सबका ध्यान मां पर होता। करीब पच्चीस सदस्यों वाले उस परिवार में कौन खाना पकाता, कौन खाता किसी को पता नहीं चलता। सबकुछ स्वस्फूर्त और प्यार से होता। ऐसा लगता कि मां के वहां आने के बाद घर में प्यार के लाखों दीप जल गए हैं।

हम बच्चे भी ढेर सारे बच्चों में खूब घुल मिल गए थे। लगता ही नहीं था कि मां बस कुछ दिनों की मेहमान है। सात महीने बीतते बीतते मां की तबीयत और बिगड़ती चली गई और एक दिन सुबह-सुबह वो इस संसार से चली गई। मां चली गई और मुझे ये लिखते हुए शर्म आ रही है कि उसके श्राद्ध होने तक सारी नानियां आपस में लड़ने लगीं। खाना कौन बनाएगा इसे लेकर झगड़ा होने लगा। जो नानियां एक दूसरे के लिए सगी बहनों से बढ़ कर थीं, वो इस कदर उलझने लगीं कि समझ में नहीं आता कि आखिर उनके बीच झगड़े की वजह क्या है।

उस बहुत बड़े घर में जहां प्यार का संगीत बजता था, कलह का दैत्य नाचने लगा। बिन बात के एक दूसरे पर ताने मारे जाने लगे। घर के बीच में दीवारें खड़ी होने लगीं। और आगे की कहानी आपको मेरे बिना बताए भी पता होगी।

मै मामा के पास चला गया। पर जब कभी उन नानियों और नानाओं के घर जाता तो सोचता कि कल तक जब ये मिल कर रहते थे तो कितने शान से ये रहते थे और आज?

किसी से झगड़ा होना, मनमुटाव होना कोई बड़ी बात नहीं। मतभेद होना भी आम बात है। किसी की बात से हम हर बार सहमत हों जरुरी नहीं। लेकिन ये मतभेद जब मनभेद में तब्दील होने लगें तो हमें सावधान होना चाहिए।

बेशक हम बेतार के संसार में मिले परिजन हैं, लेकिन मेरा यकीन कीजिए जो मजा मिल कर, एक दूसरे की इज्जत कर, मन से साथ रहने में है वो आपस में एक दूसरे से उलझ कर, झगड़ कर, एक दूसरे को नीचा दिखा कर रहने में नहीं।

मैं बहुत बड़ा नहीं हूं कि आप सबसे ये बेवजह कहूं कि हर बार जीत जाना दरअसल जीत जाना नहीं होता। कई बार हार जाना भी जीत जाना होता है।

मैं बचपन में जब अपने दोस्तों से लड़ लेता था तो मां कहती थी कि सुबह मैं हलवा बना दूंगी तुम उसके घर ले जाना और सॉरी कह कर उसे हलवा खिला देना। मैं पूछता कि हलवा क्यों? मां कहती कि हलवे की मिठास से दुश्मनी हवा हो जाती है। मीठी चीजें दुश्मनी को दूर करती हैं।

मैं आपसे भी अनुरोध करता हूं कि आज आप भी कुछ मीठा अपने उन परिजनों से कह दीजिएगा जिनसे यूं ही कहीं राह चलते आपने कड़वा कह कर दोस्ती दांव पर लगा दी हो।

दोस्ती करने में बेशक आपने नहीं सोचा होगा, लेकिन तोड़ने में जरुर सोचिएगा। हर रिश्ते की अपनी अहमियत होती है। उसे बचाना चाहिए, क्योंकि हम रहें न रहें, रिश्ते रह जाते हैं। रिश्ते रह जाते हैं, अच्छी और बुरी यादों में।

 



संजय सिन्हा

 

***

 Shubham-OK-529X180.JPG


HDFC-Ad-400X290.JPG

Let the friendship not blown of  - Sanjay Sinha

,



 

Post Your Review

Your Name  
Your Email  
Your Comment:
Type in Hindi (Press Ctrl+g to toggle between English and Hindi)
 
      
 
 
Go To Top
 
Login

     
 
                 

             

New User! Register Here.
Forgot Password?
 
 
 
 
Online Reference
Dictionary, Encyclopedia & more
Word:
by:
 
Traffic Rank
 
 
About Us  |   Contact Us   |   Term & Conditions   |   Disclaimer  |   Privacy Policy  |   copyright © 2010... Powered by : InceptLogic