- राजीव रंजन
प्रसाद
जब शीर्षक सुना था तो अटपटा
लगा – “क्यों जाऊँ बस्तर
? मरने !” किंतु बाध्य हुआ इस वाक्यांश को देर तक
सोचते रहने के लिये। 65 पन्नों की यह किताब
एक ‘आउटबस्ट’ है, अपनी सोच को एक प्रवाह में निकाल देने की कोशिश। आप किताब को हाथ में लेने के बाद इसे यूँ ही नहीं रख सकते। आप इसे न पढना चाहें तो
भी पृष्ठ दर पृष्ठ केवल उलट लीजिये “अटपटे शीर्षक” का अर्थ साकार होने लगेगा। यह किताब एक शहीद-स्मारक की तरह है जिसमें
हर पृष्ठ के उपरी हिस्से में उन शहीदों की तस्वीरे प्रकाशित हैं जिनकी जान नक्सली
हिंसा के प्रतिफल में, पूरी कायरता, से कभी घात लगा कर तो कभी बारूदी सुरंग उड़ा कर ली गयी।
320 जवानों की तस्वीरे इस
किताब में होना उन्हें श्रद्धांजलि देने के प्रयास सदृश्य है, क्योंकि हर पृष्ठ पर एक और तस्वीर अंकित
है – अमर जवान ज्योति की।
किताब का काला आवरण बस्तर के वर्तमान हालात को प्रतिबिंबित करता है तथा “मरने” शब्द को “लाल” रंग से प्रस्तुत कर विचारधारा के नाम पर जारी जंग की विभीषिका दर्शाने
की कोशिश की गयी है।
बात
पत्रकार-पुलिस संवाद से आरंभ होती है किंतु किसी सिपाही के भीतर बस्तर में हुई
पोस्टिंग से बचने, भागने के कारणों की
आड़ में नक्सलवाद के नासूर को कुरेदा गया है। बाटला हाउस प्रकरण को भूमिका की धुरी
बनाया गया है जिसमें पुलिसिया शहादत की निस्सारता को
रेखांकित करते हुए लेखक ने पत्रकारों, नेताओं तथा समाजसेवियों पर भी प्रश्नचिन्ह लगाये हैं। एक वरिष्ठ
पत्रकार जब मीडिया के प्रति अपना रोष व्यक्त करता है, खबरों तथा ‘टीआरपी’ के बीच के संबंध को उजागर करता है तो क्या आप उसे हल्के में ले सकते हैं?
पत्रकार
कौम पर उबलता एक संवाद देखिये “...जैसे हाथ में माईक पकड़े आपके भाई बंधु टीवी पर चीखते चिल्लाते हैं।
सब मजबूर हो कर सुनते हैं। आपको भी आज वैसे ही मजबूर हो कर सुनना पड़ेगा...।“ लेखक उन सरकारी बस्तर नीतियों पर भी
कटाक्ष करने से नहीं चूके जिनके कारण सुलग रहा है बस्तर तथा सिपाही मनोबलहीन-डरा
सहमा कार्य कर रहा है।
एक
संवाद यह भी देखिये – “... टुच्चे
नेता की तरह ही बोलो। लगाओ अंट शंट आरोप। पूछो, आड़े तिरछे सवाल। पूछो, क्यों घूमते हो जंगलों में? थाने में ही रहो। मरने के लिये किसने कहा था?”
लेखक
ने विभीषिका को स्पष्ट करने के लिये को कहानी बुनी है उसका पात्र कहता है – “… मेरा ट्रांस्फर मुफ्त में
नहीं रुका है भैया, ....कहाँ से लाता मैं? घर बेच कर जुगाड़ किया है।....मेरे लिये
पिता की अंतिम निशानी बचाने से ज्यादा महत्वपूर्ण था अपने बच्चों का पिता बने रहना।“
प्रेस
की स्वच्छंदता पर कटाक्ष करते हुए पत्रकार-लेखक कहते हैं – “प्रेसबिल लाने की बात चली थी
तो आप लोगों को वह काला कानून लगा था। आखिर क्यों डरते हो आप लोग कानून कायदे से? इस लिये न कि आप लोगों की लोगों को नंगा करने की आजादी छिन
जायेगी?”
कठोर
सवाल और भी हैं – “मैं
बस्तर जाउं और वापस आउं तिरंगे में लिपट कर? आपके लिये एक अच्छी ‘ह्यूमन स्टोरी’ बनने के लिये जाउं बस्तर?”
लेखक
ने विभीषिका के चित्रण में भी कोताही नहीं की है –
“आपको पता भी है जिस ‘कॉफिन’ में लाश आती है उसमे लाश नहीं होती लोथड़े होते हैं? और वे
भी अंदाज से कॉफिन में डाल दिये जाते हैं कि शायद यह
टुकडा इसी लाश का होगा?”
“देखा है कभी बस्तर का बारूदी विस्फोट?”
या
एक निरुत्तर करने वाला प्रश्न “...पुलिस में भी मरता कौन है? नया-नया जवान, ज्यादा हुआ तो हवलदार और बहुत ज्यादा हुआ
तो सब-इंस्पैक्टर।”
अनिल
जी के उस दुस्साहस की प्रसंशा करनी होगी जहाँ पत्रकार हो कर भी पत्रकारिता पर तर्जनी उठाते उनके शब्द नहीं कांपते – “मैं नेशन की भी हालत जानता हूँ। गुजरात या तनावग्रस्त इलाके में एक आदमी
मरता है तो दिन भर कुत्तों की तरह भौंकते हो आप लोग। भाषाई गुर्गे अगर 5 टैक्सी वालों को पीट देते हैं तो सारे
देश को सिर पर चढ़ा लेते हो आप लोग। आपकी ‘ओबी वैन’ की रेंज में कोई
बच्चा गढ्ढे मे गिर जाता है तो दिन रात वही दिखाते हो आप लोग। बच्चे का बोरवेल में
गिरना राष्ट्रीय समस्या हो जाती है, वह राष्ट्रीय खबर हो जाती है। एर्राबोर में नक्सलियों का किया नरसंहार
याद है आपको। छोटे-छोटे दुधमुहे बच्चे तक की गला रेतकर हत्या कर दी गयी थी। मरने
वालों का आँकडा दर्जनों में था। क्या हुआ? क्या वह खबर नेशनल नहीं थी? चलो मान लिया एर्राबोर के समय गलती हो गयी
होगी। फिर रानीबोदली कैंप में भी तो नक्सलियो ने वही
कहर बरपाया था, तब भी दर्जनों लोग
मारे गये थे?”
यहाँ
से किताब गंभीर मोड लेती है। समाजसेवी संगठनों और मानवधिकार की आड में हो रही
राजनीति पर सवाल उठाते हैं लेखक – “... क्योंकि इस देश में अपराधियों को जिंदा
रहने का अधिकार है? क्योंकि लोगों के खून
से होली खेलने वालों के मानवाधिकार हैं? क्योंकि उन्हे मारने पर चिल्लाने वाले तुम
जैसे लोग, इस समाज के ठेकेदार
हैं? क्योंकि उन्हें मामूली
सी भी खरोंच लग जाने पर हाईकोर्ट से ले कर सुप्रीमकोर्ट तक याचिकाओं की बाढ लगा
देने वाले एनजीओ और दूसरे समाजसेवी संगठन हैं?

नक्सली
मध्यस्थों पर भी प्रहार है किताब में – “फिर इसकी बात नक्सली क्यों मानते हैं? क्या ये उनका नेता है? क्या ये उनका रिश्तेदार है? है कौन बे ये? और किस अधिकार से यहाँ आता है?”
इसी
प्रश्न को आगे बढा कर लेखक ने मानवाधिकार के नाम पर रंगे सियारों की कौम की पतलून
ढीली कर दी है – “क्या
हमारे मरने पर मानवाधिकार का हनन नहीं होता?”
लेखक
ने सिपाहियों की ही नहीं उनकी शहादत के बाद विधवाओं और परिजनों की स्थिति पर भी
गंभीरता से बात की है तथा अनुकंपा नीति पर भी प्रश्न खड़े किये हैं। पुस्तक के
अंतिम पृष्ठों में मृतक सिपाही की विधवाओं से जुडे बेहद गंभीर सवाल उठाये गये हैं।
इस किताब को पढ कर यह आसानी से समझा जा सकता है कि दिल्ली से एक “तथाकथित मानवाधिकारवादी” गाली-गलौज की भाषा में इसका विरोध क्यों
कर रहा था? यह भी कि एक पत्रकार
निर्पेक्षता से जब अपनी ही आलोचना से गुरेज न करे तो कृति पर बहस होनी चाहिये।
बस्तर में सिपाहियों के काम करने के हालात तथा शहीद के परिजनों की दशा पर यह किताब बिना लागलपेट के बात करती है। यह किताब व्यवस्था में
सुधार की भी मांग करती है तथा नक्सलवाद के खिलाफ भी खडी होती है। यह एक आवश्यक
किताब है, यह किताब बस्तर की
मिट्टी को ‘लाल-आतंकवाद’ से मुक्त कराने के लिये शहीद हुए
सिपाहियों पर एक विनम्र श्रद्धांजलि भी है।

राजीव रंजन प्रसाद
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* उपन्यास ‘आमचो
बस्तर’ के लेखक (बस्तर पर हाल मे आई
तीन किताबो में से एक)
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