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गुंडा - अविनाश वाचस्पति
2/19/2012 8:01:12 PM
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- अविनाश वाचस्पति

गुंडाजयशंकर प्रसाद की कहानी का किरदार किताब से बाहर निकलकर राजनीति में अपनी घनघोर उपस्थिति दर्ज करवा चुका है। अभी सप्‍ताह भर भी नहीं बीता है कि जब पीएम पद के प्रबल दावेदार ने सामने वालों को गुंडाकहकर सम्‍मानित कर दिया। इससे एक छिपा हुआ रहस्‍य सच बनकर सामने आ गया कि राजनीति में गुंडों का वर्चस्‍व बढ़ गया है। कुछ तो पहले भी छिपकर बेनामी तौर पर सक्रिय रहे हैं, इससे भला किसे इंकार होगा? जयशंकर प्रसाद और उनके गुंडे को वह ख्‍याति अभी तक नहीं मिल पाई है, जो राजनीति के क्षेत्र में गुंडाकिरदार ने छोटी सी अवधि में ही हथिया ली है।

गुंडासंबोधन मन में अज्ञात भय को जन्‍म दे देता है। इस डर के सामने सिर्फ या तो गुंडे ही डट पाते हैं या राजनीति के घाघ। राजनीति के सिर्फ ‘बाज’ भी यहां पर पूरी तरह सफल नहीं हो पाए हैं, फिर बाकी पक्षी अथवा विपक्षी की क्‍या मजाल, यहां पर भाड़ को फोड़ने की जुर्रत करे। बाज को इसलिए सुरक्षित माना गया है क्‍योंकि वह दूर से ही जोखिम को ताड़ने और उससे बचने के गुर जानता है। चाहे वह ताड़ के लंबे पेड़ से भी सौ गुना ऊंचाई पर हो। बाजपनाइस मायने में गुंडाकारीसे श्रेष्‍ठ माना गया है। खैर, बाज को गुंडों से डर नहीं लगता और न उन्‍हें लगता है जो स्‍वयं गुंडाकारी के सिद्धहस्त होते हैं। गुंडों के लिए यह अनिवार्यता अब नहीं कि वह शक्‍ल-ओ-सूरत से भी गुंडे नजर आएं, अब सीरत इस मायने में काफी प्रभावशाली हो गई है। कहा भी गया है कि क्‍या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी सीरत छिपी रहे। मिलिए मत परंतु गुंडाकारी के सीरतधारकों से आप बचे रहें, यही बेहतर रहेगा।

प्रसाद के गुंडे नन्‍हकूजैसी बड़ी, तनी और घनी रौबीली मूंछों, गुस्‍सा भरी हुई लाल आंख और फड़कती हुई नाक की जरूरत और चेहरे पर चाकू के कटे के पुराने निशान हों, सिर पर बाल हों, या फिर सपाट हो तो भी गुंडापन निखरकर चेहरे पर दिखलाई देता है लेकिन राजनीति में गुंडों को इस तरह के मेकअप करने की कतई जरूरत नहीं पड़ती है। गुंडे के चेहरे पर यह सब प्रेम भाव न भी हों तो भी गुंडे को कभी किसी कंपनी के ‘आई कार्ड’ की जरूरत नहीं पड़ती। कभी आपने ऐसा किस्‍सा सुना हो तो बतलाइये कि किसी गुंडे ने वारदात करने से पहले अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए अपना ‘आई कार्ड’ पेश किया हो? फिर भी पीडि़त का चेहरा लाल सुर्ख टमाटर हो जाता है जो कि डरे हुए लाल खून के शरीर में तीव्र संचरण के कारण जन्‍म लेता है।

यह तो आप भी मानेंगे कि भला कोई शरीफ आदमी, किसी को भी गुंडा क्‍यों कहेगा। शरीफ आदमी की तो इतनी भी हैसियत नहीं होती है और न उसमें हिम्‍मत होती है कि वह चोर को चोर कहने का जोखिम चोरी कर सके जबकि चोर के ऐसे तेज पांव होते हैं कि जरा सी आहट पर ही दौड़ लगा लेता है अथवा चार छह मंजिल से कूद लेते हैं। चोर और डर कर भागते भूत के पैर नजर नहीं आते, यह लोक में प्रचलित है जबकि भूत जो खुद ही दिखलाई नहीं देता है तो उसके पैर इत्‍यादि भला कैसे दिखाई देंगे? यह भी विचारणीय है। चोर जब कूदते हैं तो उनके पैर टूटने की घटनाएं सुनी जाती हैं, इससे यह अनुमान लगाया गया है कि उनके पांव काफी तेज होते होंगे लेकिन कमजोर होते हैं इसलिए टूटते भी रहते हैं।

डकैतों और गुंडों के पैर अब घोड़े भी नहीं होते और वे अब कारों और मोटर साईकिलों में गतिमान रहकर अपने कारनामों को अंजाम देते हैं। उनके हाथों में हथियार होते हैं, न भी हों तो उनके हाथ ही हथियार होते हैं। वे जहां जहां से गुजर जाते हैं, वहां से शरीफ आदमी उनके आने से पहले गुजर चुके होते हैं। अगर कोई शरीफ गलती से बाकी बचा रह गया हो तो उनके आने की आहट मात्र से पतली गली से सरक लेता है।

अब इतना तो तय है कि गुंडों के सामने या तो गुंडा या खांटी राजनीतिज्ञ ही टिक सकता है और उससे पंगा ले सका है। पंगा लेने की वजह हो, न हो चुनाव हों, न हों। चुनाव कभी भी आ सकते हैं। कितनी ही शब्‍दों की ठोकरें देश-प्रदेश के बूढ़े सियासतदान मारते रहते हैं। वह पहले से ही बने हुए अपने माहौल में कमी नहीं आने देना चाहते हैं। एक बार जो साम्राज्‍य स्‍थापित हो चुका है, उसे छोड़ने का रिस्‍क भला कौन ले, इसलिए वे भी अपनी बुद्धि की शौर्यता का उपयोग करते रहते हैं।

गुंडों से डरने का ठेका बिना ठेके के, शरीफ आदमी ने ले रखा है वह डरता है, डर डरकर गीता पढ़ता है, पपीता खा खाकर अपने पेट की बीमारियों को सीता है और वोट देने के लिए जीता है। उसका बड़ी ख्‍वाहिशों से पाला गया वोट, सम्‍मोहित कर हथिया लिया जाता है। हथियाने वाले को आप गुंडा मत कहिएगा, वे आपस में खुद ही अपनी पहचान जाहिर कर रहे हैं, इतने समझदार-शरीफ तो आप हैं ही न?

 

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