- दिनेश चन्द्र मिश्र
धरती में अगर कहीं
स्वर्ग है तो कश्मीर में है। बचपन में स्कूल में मिली इस जानकारी में कश्मीर जाने
के बाद और इजाफा हो गया। जिंदगी के खौफ और पैसे की लालच में मीडिया को अलगाववादी
संगठनों के इशारे पर नाचते देखना आदत के साथ उनका अपरोक्ष रुप से उसका हिस्सा बनना
नियति बन गई थी।
लालू राज में चारा
घोटाले के बाद साथियों द्वारा बिहार को ‘भ्रष्ट राज्य’ कहने की बात से न चाहते हुए भी इत्तेफाक करना पड़ता
था। कश्मीर में करप्शन का जो हाल देखा, उसे देखकर सोच ही बदल गयी। केंद्र सरकार द्वारा कश्मीर
में विकास और विस्थापितों के नाम दिए जाने अरबों रुपए भ्रष्टाचार की कोख में कैसे
चले जाते हैं? यह नमूना किसी भी महकमे में विकास कार्यों का भौतिक सत्यापन करके जाना जा
सकता है। जम्मू में तैनात सी.बी.आई. के एस.पी. गौड़ साहब से मिले इन टिप्स की
पड़ताल करने के लिए इंटरनेट का हथियार बनाया। जम्मू-कश्मीर सरकार की वेबसाइट से
कुछ विभागों का डाटा एकत्र करने के बाद मौके पर जाकर देखने का फैसला किया। जब कश्मीर
में अमर उजाला के ब्यूरो चीफ शैलेंद्र शुक्ला के संग जिन जगहों को चिन्हित किया
गया था तो पता चला कि कोई काम हुआ ही नहीं लेकिन भुगतान हो चुका है। ऐसे ढेरों
नमूने के देखने के बाद ‘ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल’ की एक रिपोर्ट हाथ लगी, जिस में करप्शन के
मामले में देश में सबसे आगे जम्मू-कश्मीर का जिक्र था। भ्रष्टाचार तो भारत की
नस-नस में घुस गया है लेकिन कश्मीर में जिस तरह भ्रष्टाचार फैला है उसको नजदीक से
जाकर ही देखा जा सकता है। सेना को अगर हटा दिया जाए तो जम्मू-कश्मीर का भ्रष्टतंत्र
कश्मीर को कब पाकिस्तान के हवाले कर देगा, कहा नहीं जा सकता है। कश्मीर में भ्रष्टाचार सरकारी
कामकाज से लेकर आम आदमी की जिंदगी में रोजमर्रा का दंश बन गया है।
कश्मीर में भ्रष्टाचार सबसे
ज्यादा होने के बाद इसके खिलाफ आवाज उठाने वाला कोई नहीं दिखता है। उत्तर भारत में
ट्रैफिक सिपाही द्वारा दस-बीस रुपए वसूलने पर ब्रेकिंग न्यूज टाइप की खबर अक्सर
छपती है,
वहीं
जम्मू-कश्मीर में मीडिया की सारी हेकड़ी विलुप्त हो जाती है। यह बात समझ से परे
थी। भ्रष्टाचार के ऐसे कई मामलों की पड़ताल करने पर पता चला कि करप्शन में लिप्त
अधिकांश लोग अलगाववादी संगठनों से जुड़े लोग हैं। केंद्र सरकार के पैसे को हजम
करके भारत के खिलाफ ही उपद्रव करने का जो खेल कश्मीर में सियासत के साये में चल
रहा था,
उसे
देखकर बहुत कोफ्त हुई। भ्रष्टाचार के ऐसे कई खेलों को उजागर करने के लिए एक न्यूज
स्टोरी बनायी। करप्शन करने वालों के लिए कश्मीर किस तरह स्वर्ग बना हुआ है। भ्रष्टाचार
के चंद नमूनों के साथ खबर को तैयार करने के साथ उन अलगाववादी नेताओं का भी जिक्र
किया,
जिनके
गुर्गे इस काम में लिप्त है।
संपादक प्रमोद भारद्वाज को
खबर दी।
उन्होंने तारीफ करते हुए
कहा “नोएडा खबर भेजनी
होगी?”
नोएडा में शशि शेखर के
ध्यानार्थ खबर भेजने की बात सुनने के बाद दिल में लगा कि इस खबर के नसीब में भी
छपना नहीं लिखा है। खैर खबर जाने के दो घंटे बाद खबर रुकने के साथ शशि शेखर का
संदेश मिला कि दिनेश से बोल दो ज्यादा क्रांतिकारी ना बने। मेहनत करके कोई खबर बनने
के बाद जब उसके साथ ऐसा सलूक होता है तो दर्द वैसा ही होता है जैसा किसी महिला को
छेड़छाड़ के बाद होता होगा। खबर की इज्जत की ऐसी-तैसी होने के बाद आफिस में रुटीन
काम निपटाने में जुट गया। खबर रुकने की ‘खबर’ आफिस में कई साथियों को लगी।
वे सांत्वना व्यक्त करने आ गए
“भाई साहब यहां
चाहकर भी कुछ खास नहीं कर सकते हैं। जान का खतरा है सो अलग।”
उनकी बातों को सिर हिलाते
हुए सुनते रहा। मूड पूरी तरफ आफ था। दिल में गुस्सा तो दिमाग में क्या करें, क्या ना करे? सोचते हुए कई
खतरनाक ख्याल आ रहे थे। दिमाग को हल्का करने के लिए आफिस से बाहर निकलकर तवी मइया
के चरणों में जाने का मूड हुआ। रात के आठ बज गए थे, तवी के किनारे पैदल जाना मुनासिब नहीं था, लिहाजा तवी के पुल
के ऊपर पहुंचकर ही सोच-विचार संग टहलने लगा। जम्मू-कश्मीर आने के बाद घर की चिंता, पिता जी की नौकरी
छोडऩे की सीख के साथ बहुत कुछ टहलने के साथ सोचने में नजर डाली तो नौ बजने वाले
थे। दिसंबर का आखिरी सप्ताह होने के कारण ठंड का असर बढऩे लगा था। तवी नदी के पुल
पर निजी वाहनों की संख्या कम होने के साथ सेना के वाहनों की ही आवाजाही चल रही थी।
आफिस की और लौट पड़ा।
सिटी एडीशन छूटने के बाद जब
आफिस से निकला तो रात का एक बज चुका था। अनिमेष और योगेंद्र के साथ घर की तरफ पैदल
चल पड़े। रास्ते में पुलिस लाइन के गेट पर लगी घड़ी में तापमान पर नजर पड़ी तो
माइनस चार डिग्री सेल्शियस दिखा रहा था। तापमान को देखकर ठंड का और भी अहसास होने
लगा। सेना के बैरियर और चेक पोस्ट पार करते हुए घर पहुंचने के बाद रजाई में घुसने
के बाद खबर न छपने का दर्द दिमाग में घूमता रहा। दिल ही दिल में माता रानी से
प्रार्थना करते रहे कि अब अपना आशीर्वाद दे दो मां। सोच-विचार और मन्नत में उस समय
व्यवधान पड़ा जब मोबाइल में एसएमएस टयून बजने लगा। मोबाइल देखा तो बनारस के एक
मित्र का नए साल के पांच दिन पहले अग्रिम बधाई देने वाला एसएमएस था। जवाब देने का
मूड नहीं हुआ। मोबाइल साइलेंट मोड में डालने के बाद सोने की कोशिश में लग गया। न
जाने कब नींद आ गयी।
सबेरे आंख खुली तो गुलाबी
धूप छत पर पसरी पड़ी थी। फ्रेश होने के बाद आज क्या किया जाए? इसी सोच-विचार में
तैयार होकर आफिस से निकल पड़ा। आफिस में मीटिंग के दौरान प्लानिंग पर चर्चा के बाद
जम्मू-कश्मीर में हर महीने बातचीत पर लोग मोबाइल पर कितना खर्च करते होंगे? यह जानने के लिए
मोबाइल कंपनियों के दफ्तर का चक्कर काटने निकल पड़ा। मोबाइल कंपनियों के दफ्तर में
जाने पर खबर की खोजबीन में एक ऐसी खबर हाथ लग गयी जिसे राष्ट्र हित में उजागर करना
बहुत जरूरी था।

दिनेश चन्द्र मिश्र
जारी ........ 24
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