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‘दि सायलेंट श्रीक’ : एक प्रभावशाली लघु फिल्म - हरीश चन्द्र सन्सी
3/29/2015 6:53:39 PM
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‘दि सायलेंट श्रीक’ : एक प्रभावशाली लघु फिल्म

- हरीश चन्द्र सन्सी

 

घु फिल्म ‘दि सायलेंट श्रीक’ अर्थात ‘मौन चीख’, मन को छू लेने वाली ऐसी फिल्म है जो मात्र सवा छह मिनट में इस और इंगित करती है कि किस प्रकार अपने ही अपनों को लूटते हैं और यह सब कुछ हो जाने के बाद जब घटना के बारे में घर वालों को पता चलता है तब वे ऐसे मामले को दबा देना चाहते हैं देखा जाए तो ऐसे मामलों में पीड़ित को न्याय कि जरूरत होती है परिवार और समाज की समानुभूति, सहानुभूति, संवेदना, और नैतिक समर्थन की आवश्यकता होती है। आंकड़े बताते हैं कि बलात्कार के अधिकाँश मामलों में दोषी कोई अनजान व्यक्ति नहीं होता। प्राय: वह पीड़ित का रिश्तेदार, परिवार का निकटस्थ व्यक्ति, कोई परिचित ही होता है। जो जान पहचान होने का लाभ उठा कर बड़ी ही आसानी से घर में प्रवेश कर लेता है अथवा अपने लक्ष्य को बहला फुसला कर उसका शोषण कर पाने में सफल हो जाता है

दूसरी और समाज में होने वाली बदनामी के कारण या अपनों के बीच शर्मिंदा होने के डर से 92% मामलों की रिपोर्ट ही नहीं की जाती। जबकि सोचने कि बात यह है कि बलात्कार की शिकार मासूम युवती को शर्मिंदा नहीं होना चाहिए बल्कि शर्मिंदा तो उस बलात्कारी को किया जाना चाहिए।

महिलायों, युवतियों व बच्चियों होने वाले दुष्कर्मों व यौन उत्पीडन के निरंतर बढ़तेAryanSingh.jpg मामले गंभीर मुद्दा बन गए है। इस विषय पर बिना किसी लंबे-चौड़े ताम झाम के मात्र 4 कलाकारों अरुण बख्शी, राईका, अंजलि अरोरा और सुदेश कनौजिया के साथ बनी यह लघु फिल्म ‘दि सायलेंट श्रीक’ अर्थात ‘मौन चीख’ आम जन के मन पर बड़ा ही गहरा प्रभाव छोडती है। चरित्र अभिनेता अरुण बख्शी बड़े ही सिद्धहस्त कलाकार हैं और अनेक फिल्मों में विभिन्न भूमिकाओं में अपनी छाप छोड़ चुके हैं। संजय बेड़िया द्वारा प्रस्तुत टीटी बालाजी फिल्म्स, अनु अग्रवाल फिल्म्स और आर्यन सिंह प्रोडक्शंस द्वारा निर्मितआर्यन सिंह और अनु अग्रवाल के कथा विचार पर आधारित इस लघु फिल्म का लेखन, संपादन, निर्देशन व निर्माण आर्यन सिंह ने किया है। संवेदनशील व्यक्तित्व के धनी आर्यन सिंह पूर्व कलाकार हैं और डेविड धवन के सहायक निर्देशक भी रह चुके हैं।

‘दि सायलेंट श्रीक’ में एक बेटी अपने पिता कि अनुपस्थिति में आये उनके मित्र मल्होत्रा अंकल को बैठने के लिए कह कर चाय बनाने जाती है। पर उसे क्या AroonBakshi-001.jpgपता था कि उस लंपट मित्र की बुरी दृष्टि उसकी देहयष्टि पर पड़ रही है। उसके जाते ही मल्होत्रा उसके पीछे पीछे जाकर उसको काबू कर लेता है और फिर वह होता है जो कभी नहीं होना चाहिए। क्योंकि इससे मित्रता और मानवता जैसे शब्दों पर से विश्वास ही उठ सकता है। और अंत में जाने से पहले मल्होत्रा धमकी देता है। वह कहता है यह जो यहां हुआ, वो रेप नहीं था। जब ये बात इस चारदीवारी से बाहर निकलेगी तो असली रेप होगा कोर्ट में, मीडिया में, सोसायटी में, हर जगह, बार बार रेप होगा .... इसलिए श्श्श्श्श। बेटी कि हालत देख कर उसकी मां ‘श्श्श्श्श ,,,,,,, ’ करके उसे चुप रहने को कहती है ताकि उन्हें लज्जित न होना पड़े जबकि लज्जित तो उस बलात्कारी को होना चाहिए, उस मित्रता को होना चाहिए, जिसने उस विश्वास को भंग कर दिया था।

प्रश्न उठता है कि घर में आने वाले हर व्यक्ति को क्या संदेह कि दृष्टि से देखा जाए? क्या बच्चों का मिलना जुलना रोक कर उनके नैसर्गिक विकास में बाधा उत्पन्न की जाए? क्या खिल रहे हर फूल को समय से पहले ही मुरझा जाने दिया जाए?

उत्तर है, नहीं।

जरुरत तो है ऐसे नर पिशाचों को नंगा करके समाज के सामने लाने की जो अपनत्व का ढोंग करते हुएबेटी-बेटी कहते हुए हंसतेमुस्कराते चेहरों के साथ मासूमों के जीवन से खिलवाड़ करते हैं उनके यौवन को खिलने से पहले ही मुरझा जाने पर विवश कर देते हैं समाज में कलंक लग जाने का भय दिखा कर चुप चाप संत्रास भरा जीवन जीने पर विवश करते हैं उनकी चुप्पी ही बलात्कारियों को और उनके जैसे दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों को एक के बाद दूसरा और तीसरा पग उठाने के लिए निर्भय कर देती है

याद कीजिये निर्भया मामले को जिसमें बलात्कारी कितने गर्व के साथ किसी एक चैनल को न केवल साक्षात्कार देता है बल्कि लड़कियों को यह भी कहता है की यदि वह विरोध न करती तो शायद आज जीवित होती और देखिए कुछ लोगों का एक तथाकथित समूह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर, उस वृत्तचित्र को सार्वजनक रूप से दिखाने की मांग भी करता है इससे लगता है कि शायद उस मासूम के प्रति उत्पन्न होने वाली संवेदना से वे लोग कोसों दूर थे?

केवल कुछ गिने चुने मामलों में ही मोमबत्ती जलूस निकलकर विरोध करने से कुछ नहीं हो सकता ऐसे हर मामले को पूरी गंभीरता लिया जाना चाहिए। प्रत्येक बलात्कारी को उसके किये का दंड अवश्य मिलना चाहिए। इसके लिए वांछितं संख्या में त्वरित न्यायालयों का गठन किया जाना चाहिए। अब समय आ गया है कि सामने आने पर ऐसे सभी मामलों में समाज में भी भरपूर आक्रोश होना चाहिए और दुष्टों व दोषियों को सजा दिलवाने के लिए समाज के प्रतिष्ठित लोगों को आगे आना चाहिए जिससे ऐसे किसी भी गर्वितघमंडीदुर्दांत,व्यभिचारीबलात्कारी को समाज का शीलहरण करने का साहस ही न हो वैसे तो यह विषय स्वयं ही इतना विस्तृत है कि इस पर एक नहीं अनेक हिट फीचर फिल्में बनाई जा सकती हैं

दि सायलेंट श्रीक का अधिक अधिक प्रचार प्रसार होना चाहिए। यूट्यूब पर इस फिल्म को देखने के लिए नीचे चित्र पर क्लिक  कीजिए। दि सायलेंट श्रीक के लिंक को वाट्स ऐप, फेसबुक, ट्विटर पर शेयर कर के या हर संभव अन्य माध्यम से अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाया जाना चाहिए।

 TheSilentShriek-2.jpg


  HarishSansi.jpg

हरीश चन्द्र सन्सी

 

***

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The Silent Shreikk’ : an effective short film

,



 

Shweta Sharma said :
Good film on this subject. Producer has cautioned us to beware of such people.
5/13/2015 6:04:16 AM
Ramesh Prakash said :
बहुत ही मार्मिक विषय उठाया है. बलात्कारियों को पकड़ कर इतनी सजा देनी चाहिए कि कोई ऐसा गलत कदम ही न उठाए.
4/14/2015 10:58:36 AM
Kalpana Pande said :
एक अच्छी फिल्म के बारे में जानकारी देने के लिए शुक्रिया. जरुरत है बलात्कारियों के विरुद्ध लंबे एक अभियान की.
5/15/2015 7:03:01 AM
Vinay Swaroop said :
Quite right. I appreciate the efforts. Vinay Swaroop
5/16/2015 7:02:10 AM
Vinay Swaroop said :
Quite right. I appreciate the efforts. Vinay Swaroop
5/16/2015 7:02:51 AM

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