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एक लेखक-पत्रकार का चला जाना - के. विक्रम राव
4/29/2014 9:40:18 PM
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- के. विक्रम राव

फिदेल कास्त्रो का अरमान है कि वह अगले जन्म में गावो गार्सिया मार्किस जैसा लेखक बनें। हालांकि ईसाई पुनर्जन्म नहीं मानते, पर कास्त्रो मार्क्सवादी हैं जो मजहब García Márquez.jpgको अफीम कहते है। अतः अनीश्वरवादी हैं। यूं तो दुनिया गार्सिया को नोबल विजेता स्पेनी साहित्यकार ज्यादा मानती है, एक श्रमजीवी पत्रकार के रूप में कम। मगर जल्दी में लिखें गये पत्रकारी लेख भी साहित्य कहलाते हैं। फिर गार्सिया ने तो मीडिया की नई विधा को जन्माया हैं। खोजपरकता को वृत्तान्तक शैली में घोलकर खबर को ‘तीन-डी’ का आयाम दिया था। अर्थात शुष्क तथ्यों से उफनाती रपट बनाना मात्र नहीं वरन् रूमानी शैली में पेश किया गया विवरण हो जिससे पठनीयता बढ़े, कमनीयता से रूचि सरजे जिससे आखिरी लाइन तक दिमाग और दृष्टि टिकी रहे। गार्सिया के पांच दशकों बाद भी यह नई विधा अभी पुरानी नहीं हुई है। हालांकि स्पेनी भाषा के युवा पत्रकारों का कहना है, ”गार्सिया मार्किस तब थे। हम आज हैं। ये युवा पत्रकार जिनका दौर उनके जन्म के बाद शुरू हुआ यह भूल जाते है कि गार्सिया मीडियाकर्मी के रोल में आगे देखू ही रहे हैं।

1 जनवरी 1959 को वे रिपोर्टर के नाते राजधानी हवाना में कास्त्रो की क्रन्ति की रपट लिखने गये तो समझ गये थे कि सुषुप्तावस्था में जी रहे सामन्ती-पूंजीवादी लातिन अमरीका हेतु कास्त्रोवादी क्रान्ति ही सर्वव्याधिहारक है। इसीलिये उन्होंने साल भर बादMemoriesOfMyMelancholy.jpg (1960) भूमिगत मीडिया को व्यापक बनाकर, स्वराष्ट्र कोलंबिया में फौजी शासन के प्रेस सेंसरशिप, कर्फ्यू, जेल यातना का पुरजोर विरोध किया। उनकी कृति ईविल आवरइस राज्य-हिंसा पर ही आधारित है। उनका सूत्र था कि इंकलाबी लेखक सिर्फ सच ही लिखें। कानून की पढ़ाई आधे में छोड़कर समाचारपत्र कर्म अपनाने वाले गार्सिया कम वेतन भोगी थे और काम किराया होने के कारण वैश्यालय की ऊपरी अटारी पर किरायेदार भी रहे। तब वह कार्तासेना और बारान्किला नगरों के दैनिकों के संवाददाता तथा स्तंभकार थें। तब की दिनचर्या का उन्होंने उल्लेख किया कि तड़के सुबह चार बजे अखबार छापने के बाद वे कविता लिखते थें, बियर पीते थें। फिर कमरे में आते थे। रास्ते में चर्च जाती महिलायें उन्हें देखकर फुटपाथ बदल लेती थीं। क्योंकि आशंका थी यह पुरूष कही छेड़खानी न करे। इससे जुड़ी हुई उनकी रचना थी मेमोरीज़ आफ माई मेलांकोलिक व्होर्स“ (मेरी विषादभरी वारांगनाओं की यादें)।

गार्सिया सोशलिस्ट थे अतः मजदूरों और कर्मियों की त्रासदी पर उनकी कलम खूब चली। कोलंबिया की नौसेना का मालवाहक जहाज़ डूब गया तो कईयों की मौत हो गई। गार्सिया ने चौदह खोजी रपट लिखीं। शासकीय जांच समिति बैठी। सत्य जो छिपाया जा रहा था, उभर कर सामने आया कि ज्वलनषील पदार्थों की पैकेजिंग घटिया रीति से की गई थी। उसी से यह दुर्घटना हुई। मगर फौजी तानाशाह जनरल गुस्तावो रोजास पिनिला ने अखबार ही बन्द करा दिया। विदेश संवाददाता बनकर गार्सिया युरोप चले आये। वहां संगठन की आवश्यकता महसूस हुई ताकि सम्पादक के पद की गरिमा और अभिव्यक्ति निर्बाध संरक्षित रहे। उन्होंने क्यूएपी की स्थापना की। इस संगठन ने पत्रकारों की सुरक्षा दृढ़ बनाई।

फिदेल कास्त्रों से गार्सिया की मैत्री प्रगाढ और अविरल रही। हालांकि इससे उनके कई शत्रु बन गये जो उन्हें कई निर्दोष क्यूबाइयों के इस निर्मम हत्यारे का अंधभक्त कहते थे। इसीलिए उनके एक आलोचक टाम हेण्ड्रिक ने आशा व्यक्त की थी कि कास्त्रो भी गार्सिया से शीघ्र ही जन्नत में मिलें। कास्त्रों को गार्सिया सज्जन आत्मा वाले कहते थे और इस क्यूबाई राजनेता पर टिप्पणी करते थें कि कास्त्रो बोलते-बोलते थक जाता है फिर आराम करते-करते बोलकर थकान मिटाता है। गार्सिया के एक आलोचक ने उनकी रचना के विषय में बहुत बुरा-भला लिखा। गार्सिया ने उससे कहा, ”तुम्हारी रचनाओं से तुम्हारी पत्नी बेहतर है।

गार्सिया की जीवन गाथा की समता आजादी के पूर्व के भारतीय सम्पादकों के संघर्षों की कष्ट कथा से की जा सकती है। गार्सिया अपने जीवन की श्रेष्ठतम कृति वन हण्ड्रेड ईयर्स आफ सालिट्युड“ (एकान्त के सौ वर्ष) जिसपर उन्हें नोबल पुरस्कार मिला की रचनाकाल का किस्सा दिलचस्प है। वे अठारह माह तक इसे लिखते रहे। मकान मालिक किराये का तकाजा करता रहा। गार्सिया ने कहा कि किताब छपते ही किराये से अधिक राशि दे देंगे। जब अन्ततः किताब समाप्त हुई तो पत्नी मासिमिस वार्चा ने अचरज के साथ पूछा, ”क्या वाकई में किताब पूरी हो गई? फिर बताया कि तब तक उन पर बारह हजार डालर का उधार चढ़ गया है। इस कृति की तीन करोड़ प्रतियां पैंतीस भाषाओं में छपकर बिकी। स्टाकहोम में नोबल पुरस्कार समिति ने कहा भी कि दुनिया गार्सिया की हर किताब को एक महत्वपूर्ण घटना मानती है। उस वक्त कास्त्रों ने गार्सिया को पन्द्रह सौ बोतलें रम (शराब) की भेंट दी। उत्सव मना। उनके बारे में साथी नोबल विजेता मारियो लोजा ने कहा गार्सिया लिखता इसीलिए है कि लोग उसे ज्यादा प्यार करें।

तब संवाददाताओं के सवाल के जवाब में गार्सिया बोले थे कि पत्रकार जीवन के कारण ही वह जमीनी वास्तविकता से जुडे़ है और उसी अनुभव को कलमबन्द करते है।

गार्सिया का बचपन, उनकी जवानी की पुख्ता नींव रख गया था। उनकी नानी उन्हें राजा-रानी के किस्सों के साथ मायावी कहानियां भी सुनाती थी, जैसे भारतीय नानी-दादी पंचतंत्र से सुनाती हैं। तभी से गार्सिया ने फंतासी और भाषायी तिलिस्म सीख लिया, अपनी शैली गढ़ ली। उनके पिता ने घर की दीवारों पर सफेदी पुतवाई थीं ताकि बालक गार्सिया उस पर तस्वीरें बना सके, विचारों को चित्रित कर सके। बचपन की यादों के सहारे गार्सिया ने एक गांव की कल्पना की। नाम रखा माकोन्दों, ठीक भारतीय लेखक आर.के. नारायणन के मालगुड़ी की भांति।

गार्सिया के लेखन पर उसके माता-पिता की शादी का भी प्रभाव पड़ा। नाना और दादा उनके विवाह के विरूद्ध थे। तब गार्सिया के युवा पिता प्रेमी के रूप में अपनी प्रेयसी को असंख्य प्रेमपत्र और तार भेजते थे और उसके वातायन तले सांध्यगीत अलाप कर अपनी विरह वेदना को वाणी देते थे। अन्ततः गार्सिया के नाना-नानी पसीजे। इस घटना को भी गार्सिया ने अपनी रचना का विषय बनाया था।

गार्सिया को विषय एक महान साहित्यकार के तौर पर याद रखता हैं पर हम पत्रकार उनकी हिम्मत को उदाहरण मानते है जब उन्होंने ड्रग माफिया पानलो एस्कोबार के गिरोह को अपनी रपट में बेनकाब किया था। इस माफिया को अपहरण, हत्या और तस्करी आदि में महारत थी। गार्सिया को मौत का खौफ नहीं था। जब पेशा ही खोजी पत्रकारिता का चुना, तो मूसल से क्या डर? इसी संदर्भ में एक जिक्र और भी। फिदेल कास्त्रों ने अपने उद्घाटन भाषण में राजधानी हवाना में विश्व श्रमजीवी पत्रकार अधिवेशन में (1986) कहा था कि पत्रकारिता निर्भयता से करो। वहां भारतीय प्रतिनिधि बनकर मैंने फिदेल कास्त्रों से पूछा कि वे पुनर्जन्म लेकर गार्सिया जैसा लेखक क्यों बनना चाहते हैं। वे केवल मुस्कुराएं और कहा यह उनकी अकांक्षा है। अब हम भारतीय यह मान कर चलेंगे कि कास्त्रो पर भी हिन्दुओं का असर पड़ा हैं। भले ही वे भारत में वोटर नहीं है

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के. विक्रम राव

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Leaving of a  writer-journalist _ K. Vikram Rao

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हरी प्रसाद said :
राव सर ने 'गार्सिया मार्किस' के जीवन का पूरा सार ही प्रस्तुत कर दिया है. बिल्कुल गागर में सागर जैसे. - हरी प्रसाद
5/5/2014 1:27:50 PM
अनुभव राज said :
समाज के ऐसे चतुर चितेरे को हमारी कोटिश कोटिश श्रद्धांजलि ..... - अनुभव राज
5/7/2014 10:11:23 AM

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