महका-बहका तन फिरै
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श्याम सखा ‘श्याम’
मौसम की मनुहार सुन,
बादल बरसा रात,
प्रीत, प्रेम की दे गया,
धरती को सौगात।
बासंती बयार का है,
अपना अलग सरूर,
बिना घुंघरू नाच रहा, सबका मन मयूर।
पौर-पौर छलकै सखी, मेरे मन की प्रीत,
उसका क्या कसूर भला, फ़ागुन की यह रीत।
गये दिवस ठिठुरन भरे, आया है मधुमास,
महका-बहका तन फ़िरै, मन में है उल्लास।
मौसम को भी भा गया,
फागुन का यह राग,
बाहों में गौरी लिये,
साजन खेलें फाग।
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