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‘तमाशा मेरे आगे’ : स्तंभों का असाधारण संकलन
6/15/2014 8:23:53 PM
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- पदमपति शर्मा

र्सा हो गया इधर कुछ लिखे। हालांकि इधर छिटपुट टिप्पणियां करता रहा था मगर जिन दो मुद्दों पर लिखने की तमन्ना थी, वह अन्यान्य कारणों से पूरी नहीं हो पा रही TamashaMereAage-Cover.jpgथी। एक तो था आम आदमी पार्टी के सुपर आला कमान अरविंद केजरीवाल के नाम खुला पत्र। अपनी अति महत्वाकांक्षा के चलते आसमान से धरती पर आ गिरने वाले केजरी के लिये खुद में झांकने का समय है। वह अब उतने प्रासंगिक नहीं रह गए हैं, इसलिए उन पर फिर कभी। दूसरा जो कहीं ज्यादा जरूरी था वह था जनसत्ता में प्रकाशित साप्ताहिक स्तंभों के संकलन की असाधारण पुस्तक ‘तमाशा मेरे आगे’ के बारे में अपने साथियों को अवगत कराना। बताने की जरूरत नहीं कि वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा ने वाकई अपने स्तंभों में भी गजब ढाया है। कैलास मानसरोवर की दुर्गम यात्रा पर उनकी पुस्तक 'द्वितीयोनास्ति'- ने हेमंत को चिंतक-यायावर - साहित्यकार की पंक्ति में ला खड़ा कर दिया था। उस पर मैने कुछ टूटा-फूटा लिखा था। मनसा-वाचा-कमॆणा हेमंत काशी को जीते हैं, जो उनके थोड़ा भी करीब है, वह इस तथ्य से परिचित है। हेमंत गुरु की दोनों पुस्तकों में चप्पे-चप्पे पर काशी नजर आएगी। मगर एक फर्क यह है कि 'द्वितीयोनास्ति'को जहां मैं एक सांस में बांच गया था वहीं 'तमाशा मेरे आगे' का आलम यह रहा कि जिस मकर संक्रांति की शाम यह पुस्तक मेरे हाथ लगी थी, तब से लेकर आज तक मैने कितनी बार इसका पारायण किया होगा, गिनती नहीं कर सकता। सच तो यह है कि पुस्तक का हर अध्याय अलग अलग विश्लेषण मांगता है। यही कारण है कि जब - जब लिखने बैठा, यह समस्या आड़े आती रही। मैं पहले भी जिक्र कर चुका हूं कि बतौर पत्रकार हेमंत शुरू से ही कुछ हट कर रहे हैं। उनके लेखन में साहित्य का पुट भी कहीं से नहीं चौंकाता। प्रख्यात उपन्यासकार श्रद्धेय मनु शर्मा पिता हैं तो वह डीएनए में मिलना ही था पर चौंकाता है विषय का गहरा अध्ययन - चिंतन और गद्य में पद्यात्मकता शैली जो पाठक के सीधे दिल में उतर जाती है।

पुस्तक में 41 स्तंभों को शामिल किया गया है। हालांकि सभी हैं तो गैर राजनीतिक। मगर वर्तमान व्यवस्था पर वे कदम - कदम पर चोट करते चलते हैं, यह भी बेहिचक स्वीकार करना होगा।

भाई ओम थानवी की सम्पादकीय दृष्टि को प्रणाम ही कर सकता हूं। जब वह हेमंत से कहते हैं- 'लिखते रहिए पुस्तक आकार ले रही है'हेमंत कबीर चौरा मोहल्ले में पैदा हुए हैं तो जहां उनके लेखन में फक्कड़ी है, वहीं आचायॆ शंकर का अद्वैतवाद भी।

पत्रकार देबांग ने कभी मुझसे उपहास उड़ाने सरीखे अंदाज में कहा था, 'हम टेलीविजन में इलाहाबाद - बनारस के ड्राइंग रूम में बोली जाने वाली भाषा से दूर ही रहते हैं। 'देश के गैर हिंदी भाषी पूर्वोत्तर राज्य से आने वाले देबांग भाई को यह पुस्तक पढ़ाने की जरूरत है। तब उन्हे समझ आएगी कि भाषा की रवानी और सीधे दिलों में उतरने वाले छोटे-छोटे वाक्यों की खूबसूरती किस चिड़िया का नाम है। साथ ही यह भी कि ड्राइंग रूम की नहीं, यह काशी की लोक भाषा है। हेमंत की सोच के व्यापक दायरे का प्रतिबिंब आपको हर स्तंभ में पूरी शिद्दत से नजर आएगा। कौन सा विषय है जो अछूता रखा है लेखक ने। शुरुआत जाहिर है कबीर से ही होनी ही थी। फिर केशव भी हैं तो काशी मे भोगा यथार्थ यानी आंखन देखी भी। हेमंत विश्वनाथ की नगरी में जन्में तो शिव होंगे ही और तब राम-कृष्ण कैसे छूटते। नायक हैं तो रावण भी है। रिश्तों पर हेमंत का लेखन अगर गुदगुदाता है तो अंदर तक भिगोता भी कम नहीं। वह चाहे ममतामयी मां हो या स्नेह की बारिश से हमेशा तर करने वाली चाची अथवा जिसके नाम के आगे दो बार मा लगे वह मामा हों। समस्त मौसम भी हैं तो तीज त्यौहार भला कैसे छूटते और कैसे भूलते हेमंत व्यंग्य का काशिका अंदाज जिसमे उनका तोता प्रेमचंद के 'आत्माराम' की तरह 'तोता चश्म' नहीं कुछ और है। पुस्तक में यात्रा वृतांत ऐसे कि आपको गाइड की कोई जरूरत नहीं। बनारसी कहीं भी रहे, उसका जीने का अंदाज नही बदलने वाला।

काशी स्वाद का भी शहर है और हेमंत गुरू ने यहां भी कलम तोड़ दी। जब उन्होंने बचानू साव ( राजबंधु मिष्ठान्न भंडार के अधिष्ठाता स्व राजकिशोर गुप्त ) पर लिखा। यह पुस्तक जिस दिन मुझे मिली थी, उसी रात कुछ अजीब सा अनुभव मुझे और हेमंत दोनों को बचानू की आत्मा ने कराया था और जिसकी चर्चा मैने तब की भी थी यहीं।

पुस्तक में गुरुवर प्रभाष जोशी भी हैं तो मूधॆन्य समालोचक नामवर सिंह भी। लेखक कितना महीन कारीगर है कि आप देखिए - मानसिक धरातल पर दोनो ही महानुभाव तीर घाट- मीर घाट हैं पर हेमंत ने दोनो को किस कदर साधा, यह भी कम लाजवाब करने वाला नहीं। मेरे भी पथ प्रदशॆक रहे चिंतक सम्पादकाचायॆ प्रभाष जी यदि आज होते तो इस पुस्तक के सम्मान में वह निर्गुण भजन संध्या का आयोजन जरूर करते।

हेमंत का लेखन तब एवरेस्ट पर जा पहुंचता है जब वह स्वयं की मौत का आंखों देखा हाल लिखते हैं। चिता पर लेटा शख्स अपने ही बारे में की जा सकने वाली टिप्पणयों को उकेरता है तब उनकी साफगोई हिला कर रख देती है। काशी में क्यो मृत्यु शोक नहीं, उत्सव है इसका भी जीवंत शब्द चित्र आपको दिखेगा। हेमंत मेरे भाई लिखते रहो - चरैवति चरैवति !!

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  पदमपति शर्मा

 

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‘Tamasha Mere Aage’ : collection of columns

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