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ठेल बेटा ठेल - सूरज प्रकाश
12/14/2014 12:51:05 PM
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- सूरज प्रकाश


व्यंग्य

ठेल बेटा ठेल

- सूरज प्रकाश

ठेल बेटा। बिना देखे ठेल। ठेलता चल। तू ही असली ठेलनहार है। ठेलक है। ठेलवा है। आधुनिक भाषा में कहें तो तू ही फारवर्डिंग एजेंट है। जो भी मिले उसे फारवर्ड कर। सब तेरी राह देख रहे हैं बेटा। तू ठेलता चल। जो भी पीछे से आये, उसे आगे ठेल। सबके पास ठेल। वापिस पीछे ठेलने की व्‍यवस्‍था नहीं है। जो पीछे से आया है, पीछे तभी वापिस जायेगा जब तू उसे आगे ठेलेगा। फारवर्ड करेगा। पूरी धरती का चक्‍कर लगा कर ही चीजें वापिस पहुंचती हैं। ठिलती हैं। तू आगे ठेलेगा तभी वे उसे और आगे ठेल पायेंगे। जब तू ही नहीं ठेलेगा तो आगे वाले को ठेलने के लिए क्‍या मिलेगा। बाबा जी का ठिल्‍लू। चल बेटा। अपना धर्म निभाता चल।

मत देख कि मैसेज में क्‍या है, कहां से आया है, इसे किसने भेजा है, और क्‍यों भेजा है। तू तो बस इसे ठेल। मत देख कि ये किसके पास जा रहा है, क्‍यों जा रहा है, तेरे किस काम का था और किसके किस काम का है। याद रख, तुझे मैसेज ठेलने वाले ने भी ये नहीं देखा कि कहां से आया, उसमें क्‍या था, बस उसे तो बस ठेलना था, ठेल दिया। तू भी वही कर। उसे पता है जिसने यह पोस्ट भेजी थी, उसने भी नहीँ पढ़ी है और जिसके पास जा रही है, वह भी नहीं पढेगा, बस मिलते ही ठेल देगा। यही परंपरा है। यही नियम है।

फारवर्ड करना, ठेलम ठेल करना निरंतरता का पहला मूल मंत्र है। इसमें बाधा मत बन। ठेलना जीवन है। अमरता है। ठेलन फुल सर्किल है, एक क्रिया है, सोच है, शैली है, बड़ी समाज सेवा है, अर्थ व्‍यवस्‍था है। ठेलन मल्‍टीप्‍लीकेशन का अंतर्राष्‍ट्रीय बाजार है। एक आदमी भेजता है, दूसरा उसे फारवर्ड करता है। पहिया चल पड़ता है। पूरी दुनिया निहाल हो जाती है।

इसके पीछे पूरा मोबाइल उद्योग हैं। वहां हजारों इंजीनियर और हजारों एमबीए हैं। उनकी मोटी पगारें हैं, पगार से मोटे सपने हैं, और सपनों से भी महंगे आइडियाज़ हैं जिनसे ये दुनिया बदलेगी। देख तो सही तेरे एक फारवर्ड से कितने घर चलते हैं। तू अगर फारवर्ड करना बंद कर दे तो सोच तेरे अठेलन कार्य से कितने पिज्‍जा सेंटर और कॉफी शॉप्‍स बंद हो जायेंगे। जरा सोच, युवा पीढ़ी तब क्‍या करेगी। लोग तब उल्‍लू रह जायेंगे। विदेशों में उल्‍लू बेशक समझदार हो, भारत में तो उल्‍लू ही रहता है। तू देश को उल्‍लू बनने से रोक और ठेलन क्रिया जारी रख।

चल, तुझे एक कहानी सुनाता हूं। एक थे राजा भर्तृहरि। वही अपने अमर फल वाले। उन्‍हें एक साधु ने दिया अमर फल। बिना ओपन किये फल रानी को फारवर्ड कर दिया। रानी ने अपने प्रेमी को। प्रेमी ने अपनी प्रेमिका को। अमर फल एक से दूसरे प्रेमी को फारवर्ड होता रहा और सर्किल पूरा करके वापिस राजा के इन बाक्‍स में आ गिरा। पूरे सर्किल में किसी ने किसी की भी प्रोफाइल नहीं देखी, फ्रेंड लिस्‍ट चेक नहीं की। यहां तक कि गूगल सर्च में अमर फल के बारे में कुछ सर्च ही नहीं किया। फ्री होम डिलीवरी के साथ फ्री का अमर फल बैकवर्ड इतिहास का गवाह बना। यही होता है। पैकेट ओपन किये बिना आगे ठेलने पर अमरता नहीँ मिलती।

कितना कुछ तो है बाजार मेँ जो फारवर्ड हो रहा है। संता बंता, बेकार के तथ्‍य, उल्‍टी सीधी बातें, उपदेश जो पढ़े बिना आगे ठेले ही जाने हैं। कभी दर्दनाक तस्‍वीरें और कभी साक्षात भगवान। तेरे सब यार दोस्‍त इसी धंधे में लगे हैं। वही सब कुछ घूम फिर कर, पूरी धरती के सात चक्‍कर काट कर बार बार इन बाक्‍स में लौट आता है।

तुझे तो अपने बचपन की याद होगी जब वैष्णो देवी या किसी देवता या यमदूत के संदेश वाले छपे हुए या हाथ से लिखे पोस्‍टकार्ड आते थे। उन पर धमकी लिखी होती थी कि इसे छपवा कर आज ही पचास जगह ठेल नहीं तो स्‍वर्ग की एंट्री का पासवर्ड भूल जायेगा। तब यही लगता  था ना कि डाकखाने वालोँ ने भी पोस्‍ट कार्ड बेचने के लिए एजेंट रख छोड़े हैं। अब समझ मेँ आता है कि वे डाकखाने के नहीँ बल्‍कि फारवर्डिंग एजेंट या ठलुए होते थे। वही ठलुए अब टेक्नोलॉजी के ठेलुए हो गये हैं।

तो बेटा। राम भली करेंगे। ठेलता चल।

एच1/101 रिद्धि गार्डन,

फिल्‍म सिटी रोड, मालाड पूर्व

मुंबई 400097 मोबाइल 9930991424

Email : mail@surajprakash.com

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Push dear push – Suraj Prakash

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